दादा-दादी की कमी खली तो कई बेसहारा बुजुर्गों को अपने घर में दिया आसरा

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Updated on 16 Sep, 2017 at 9:45 pm

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आज के इस बदलते दौर में कई ऐसे बच्चे हैं जो अपने माता-पिता को उम्र के आखिरी पड़ाव पर अकेला छोड़ देते हैं। यहां तक कि जिन्होंने पाल पोस कर बड़ा किया, चलना सिखाया उनको घर से ही बेदखल कर देते हैं। ऐसे बुजुर्गों के लिए उम्मीद की किरण बना है इंदौर स्थित श्रीराम निराश्रित वृद्धाश्रम, जहां कई बुजुर्ग एक छत के नीचे में हंसी-खुशी रहते हैं।

परिवार से बेदखल कर दिए गए इन बुजुर्गों के दिल में पीड़ा तो है, लेकिन उस पीड़ा को कम करने के लिए शहर की एक युवा टोली इन बुजुर्गों का सहारा बनी है। इस वृद्धाश्रम में 70 की दहलीज पार कर चुके बुजुर्ग बतौर दादा-दादी बनकर रह रहे हैं और पोते-पोतियों के रूप में युवाओं की टोली इनकी देखभाल कर रही है। इन युवाओं का प्रयास है कि वे इन्हें हर वो ख़ुशी दे सकें जिनके वे असल हकदार हैं।

ऐसे हुई इस वृद्धाश्रम की शुरुआत

इस वृद्धाश्रम की शुरुआत करीब दो साल पहले हुई थी। 23 साल का यश पाराशर नाम का एक युवक जब एमवाय अस्पताल गया हुआ था, तो उसे वहां एक बुजुर्ग महिला दिखाई दी, जिसके साथ कोई भी नहीं था। वह उनकी हालत को देखकर उन्हें अपने घर ले आया। यश ने अपने छोटे से घर में इस बुजुर्ग महिला को रहने का आसरा दिया और उनकी देखभाल करने लगा। युवक के इस कदम से उसके अन्य कई दोस्त भी प्रभावित हुए।


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दोस्तों ने ऐसी कई और बुजुर्गों की आपबीती युवक से साझा की और घर में एक वृद्धा को और लाने का निर्णय लिया गया। इस तरह घर में सदस्यों की संख्या बढ़ती गई। इस कारण अलग से घर लेना पड़ा, जिसका नाम रखा गया श्रीराम निराश्रित वृद्धाश्रम।

यश बताते हैं कि उनके परिवार में उनकी बहन और उनकी मां ही है। उन्हें हमेशा से दादा दादी की कमी खलती थी। जब उन्होंने बुजुर्गों को घर में लाने के बारे में अपनी मां को बताया तो उनकी मां ने भी उसका साथ दिया।

समय बीतने के साथ कई लोग जुड़ने लगे। कार्य को आसान करने के लिए नार्मदीय सेवा फाउंडेशन बनाया गया। अभी तक ये आश्रम 24 बुजुर्गों का आसरा बन चुका है, जिनमें से 16 बुजुर्गों के परिजनों से काउंसलिंग कर, उन्हें वापस उनके परिवार भेजने में कामयाबी भी मिली है।

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