‘Write off’ और ‘Waive off’ में है बड़ा अंतर, जिसे मोदी सरकार के आलोचकों को जानने की है जरूरत

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Updated on 18 Nov, 2016 at 4:28 pm

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कुछ दिन पहले आपने एक खबर सुनी होगी जिसने सोशल मीडिया पर अपना ध्यान खींचा। न्यूज़ वेबसाइट DNA ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने 63 कर्जदारों का 7016 करोड़ रुपए के बकाया लोन को डूबा हुआ मान लिया है, जिसके चलते कर्ज माफ कर दिया गया है।

इन 63 कर्जदारों में शराब कारोबारी विजय माल्या भी हैं। ये राशि 100 लोन डिफाल्टरों पर बाकी कुल राशि का करीब 80 प्रतिशत है। माल्या पर देश के कई बैंकों का 9000 करोड़ रुपए का कर्ज बाकी है, जिसमें से किंगफिशर एयरलाइंस पर 1201 करोड़ रुपए का लोन है।

DNA ने जिस तरह से इस खबर को प्रकाशित किया है यकीनन लोगों का ध्यान इस पर गया। वहीं, मोदी के आलोचकों, मीडिया में मौजूद कथित तौर पर सत्ता विरोधी पत्रकारों और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार को घेरना शुरू कर दिया।

आलोचकों में से कइयों ने इस खबर को सरकार पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाओं के साथ ट्वीट किया:

लेकिन सरकार की इस आलोचना करते हुए शायद वह अर्थशास्त्र के मूल्यों को भूल गए।

इस एक रिपोर्ट ने कर्ज माफ़ी की खबरों को गलत ठहराते हुए सच्चाई को सामने रखा है।

सच्चाई ये है कि माल्या का लोन माफ नहीं किया गया है बल्कि लोन ”write off” किया गया है। विजय माल्या सहित विभिन्न बड़े कर्जदारों के ब्योरे सिर्फ खातों में बदले गए हैं। यह एक प्रक्रिया के तहत किया गया है। Write off  का ये मतलब नहीं है कि लोन माफ कर दिया गया है। अब भी सभी लोन डिफॉल्टर्स को लोन चुकाना होगा।

Write off करने का मतलब सिर्फ इतना होता है कि बैंक ने अकाउंटिंग बुक में लोन को नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) मान लिया गया है। Write off करने को लोन की माफी नहीं कहा जाता है और लोन की रिकवरी की सारी कोशिशें आगे भी जारी रहेंगी।

खबर की सच्चाई जानने के बाद ट्विटर पर लोग पत्रकारों पर जमकर बरसे, जिन्होंने खबर की पड़ताल किए बगैर खबर को सच मान लिया:


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