कभी लगाती थी निशाना, अब संतरे बेचने को मजबूर है यह राष्ट्रीय अवार्ड विजेता तीरंदाज

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Updated on 2 Feb, 2017 at 8:49 pm

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बुली बासुमातरी को लोग अब तक एक अवार्ड विजेता राष्ट्रीय तीरंदाज के रूप में जानते रहे हैं। असम के चिरांक जिले में रहने वाली बुली खेल की दुनिया में एक बड़ा नाम रही है। बुली वर्ष 2004 से भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के सानिध्य में तीरंदाजी के खेल में झंडे गाड़ती रही है। महाराष्ट्र में आयोजित नेशनल जुनियर आर्चरी चैम्पियनशिप में वह दो गोल्ड मेडल और एक सिल्वर जीच चुकी है।

बुली खबरों की सुर्खियों में तब आई, जब उसने झारखंड में आयोजित 50 मीटर के इवेन्ट में नेशनल सीनियर आर्चरी चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इन अवार्ड्स के अलावा बुली बासुमातरी के नाम राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर पर कई अन्य अवार्ड्स भी हैं। तीरंदाजी के क्षेत्र में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रही बुली की जिन्दगी वर्ष 2010 में कठिन हो गई, जब चोट की वजह से उसे खेल से बाहर हो जाना पड़ा। कुछ महीने बाहर रहने के बाद जब वह फिट हुई तो आर्थिक तंगी आड़े आ गई। और वह खेल में वापसी नहीं कर सकी।

बुली अब अपना जीवन चलाने के लिए संतरे बेच रही है।

thenortheasttoday


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बुली के परिजनों का कहना हैः



चोटों की वजह से उसे खेल से दूर जाना पड़ा। बाद में खराब आर्थिक स्थिति की वजह से वह वापसी नहीं कर सकी। धनष और तीर की कीमत अधिक होती है। हमें सरकार की तरफ से कभी मदद नहीं मिली।

शादीशुदा बुली अब दो बच्चों की मां है। वह भारत-भुटान सीमा के नजदीक राष्ट्रीय राजमार्ग -31 पर स्थित समथाइबारी में संतरे बेचकर अपना जीवनयापन करती है। खाली वक्त में एक स्थानीय विद्यालय के चार छात्रों को तीरंदाजी का प्रशिक्षण देती है।

बुली कहती हैः

मैनें कई बार पैरामिलीटरी फोर्स ज्वाइन करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही।


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