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ई फिसड्डी ठंड; सुग्गन काका को सब पता है भइया।

Published on 4 January, 2016 at 6:12 pm By

“अब कहां ऊ ठंड, ऊ मनई लोग। अरे बाबू ठंड के महीना के मतलब जीयअ, खा, काम करअ आ सुत्तअ। भिन्सहरे उठ के भांग मिला के दू गिलास ऊख के रस पियअ और कौडा ज़रा के देहि सेकअ। ई सब हमरे टेम में होत रहे। अब ई नई डिज़ाइन के छोकरन में कहां ऊ बात। इनकी चेचिसे में लमलेट है।”

SAGAN-KAKA


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रजैईया से बिलारी जैसे मूंह निकारे सुग्गन काका भुर-भुराई दिए। आइसा लग रहा था, जैसे दूरदर्शन के रामायण पर मेन सीन में काल चक्र आ गया हो और उस मुनि की जगह स्वयं सुग्गन काका विराजमान हों और ब्रह्मांड में यह संदेश फैला रहे हों कि “हम सुग्गन काका हए, औऊर ऐसा कूछो नाही है, जो हमे पता ना हो, हमरे जमाने में ना हुआ हो।”

वैसे सुग्गन काका हैं भी बॅड्बोल टाइप के। का मज़ाल उनके सामने कोई बिना कुछ सुने निकल जाए। अपने इसी अंदाज़ के खातिर पूरे गांव में जनक के धनुष के तरह फेमस हैं की आज तलक कौनो ऐसा बीर नही मिला, जो बातनकी रसरी ओनके कान में चढ़ा कर बांध सके।

खैर, आज घर में मेहमान लोग आए हैं। इसलिए दूध लेने सुग्गन काका के घर पहुंचे  थे। अब हम कौन सा बीर ठहरे की बिना कुछ सुग्गन काका से सुने आई जाए। तो बस काका ठंडक मौसम पर पिल गये।



“जानौ बाबू पहीले जौन मज़ा ठंड के रहे ऊ अब नाही बा। तोहार काकी के खातिर ऊ इल्लहाबादी अमरूद लाए के वास्ते भूपिंदर सिंह के चारदीवर लांघ जायत रहे।” अजबे अमरूद रहे ऊ, ठंड वाला, तोहार काकी तो कौनो चमत्कार से कम नाही समझती रहे और एहे बात से खुश होकर लाजो जौन सरसो का साग बनावट रहे .. आ हा आ ! मतलब पूरे बदन मा रौनक आ जात रहे। लेकिन अब सबबे चीज़ बदल गवा। ना काकी रही, ना पहीले जैसे छोकरे ना ठंड ना कुच्छू और।”

“अब ई सहर वाला ठंड है। कोहरा नाही अब धुआं है। कूवा का पानी नाही, बिजरी का गरम पानी है। पहले जे लंबे-लंबे प्रेम पत्र दुपहरियां में बरगदे के नीचे बैठ कर लिखत रहे। अब टुन-टूनहवा मोबाइल है। जाने का होई गवा देश का, धूप से डरात है। अरे मज़ा तो सरसो का तेल लगाई के दुवरे लेतेय में है। ई ठंड बेकार है। ना ऊख है, ना चोखा, ना बुकुवा है, ना अंघोचा, ना गरम जीलेबी है, ना घर का सिरका, ना कौडा है, ना ओपर धिका के चाय पीए के मज़ा। सब बेकार होई गवा। हम ता सच में बड़ा फिकर में बानी बाबू का होई ई ठंड का। का होई ई देश का।”

बात तो काका सही कह रहे, लेकिन अब आऊर झेले के शक्ति बची ना हममें। सो जल्दी से पतीले मे दूध छाने और निकल लिए। वरना काका के तो काटल सापों पानी ना मांगे। हमर का औकात?


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काका की फिर एक नयी बीड़ी सुलग उठी। मूडी उठा के एहर ओहर ताके .कौनों नया बकरा मिले और हम घिसक लिए ।

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