वैश्यालय और दुर्गा प्रतिमा का क्या है कनेक्शन ?

Updated on 1 Oct, 2018 at 7:05 pm

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दुर्गा पूजा कुछ दिनों में शुरू होनेवाली है और पूरे देश में इसको लेकर तैयारियां हो रही है। दस दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में आदिशक्ति देवी दुर्गा की आराधना की जाती है, जिन्हें जगदम्बा भी कहते हैं। अर्थात् पूरे ब्रह्माण्ड की जननी मां दुर्गा ही हैं जिन्होंने महिषासुर का वध कर जगत का कल्याण किया था। लिहाजा पूरे देश में भक्त इस दस दिन मां की पूजा करते हैं, लेकिन कोलकाता में इस पूजन को बड़े उत्सव के साथ मनाया जाता है। आज कल यहां तैयारियां चरम पर है और लोग पंडालों और प्रतिमा को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं।

 

इस बीच, खबर है कि शहर के सोनागाछी रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर्स ने दुर्गा पूजा के लिए मिट्टी देने से किया इनकार कर दिया है। लेकिन क्या आपको पता है कि ऐसे इलाकों से आखिर पूजा के लिए मिट्टी की जरूरत पड़ती क्यों हैं?

 

 

दरअसल, जगत जननी की पूजा महज एक पूजा नहीं है बल्कि मानव समुदाय की कुशलता का उत्सव भी है। इस पूजन में समस्त समाज की भागीदारी हो, इसके लिए अलग-अलग जगहों से मिट्टी लाई जाती है, जिसमें वेश्यालय के आंगन से लाई गई मिट्टी को पूजन के लिए शुभ माना जाता है। हालांकि, इस बार कोलकाता के रेड लाइट एरिया सोनागाछी के निवासियों ने मिट्टी देने से मना कर दिया है।


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सेक्स वर्कर्स असोसिएशन दरबार समन्वय कमिटी के मेंटर और सलाहकार भारती दे की मानें तो उन्होंने सर्वसम्मति से ऐसा निर्णय लिया है। समाज की मुख्यधारा में सेक्स वर्कर्स को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। ऐसे में महज दिखावे के लिए मिट्टी ले जाकर पूजन करना ठीक नहीं है। लिहाजा हमने इसका विरोध किया है। जानकारी हो कि इस प्रकार की मिट्टी कई दुकानों में भी उपलब्ध है जिसे ‘दशा मृतिका’ कहा जाता है।

पुराण विशेषज्ञ नृसिम्हा प्रसाद भादुड़ी कहते हैंः

”  देवी पूजा अनुष्ठान के लिए दस जगह की मिट्टी ‘दशा मृतिका’ की जरूरत होती है, जो कि सामाजिक समरसता का परिचायक है। इसमें वेश्यालय के अलावा, पहाड़ की चोटी, नदी के दोनों किनारों, बैल के सींगों, हाथी के दांत, सुअर की ऐंड़ी, दीमक के ढेर, किसी महल के मुख्य द्वार, किसी चौराहे और किसी बलिभूमि की भी मिट्टी लाने का प्रावधान है। अब ये दुकानों पर भी उपलब्ध होता है, लेकिन उसकी प्रमाणिकता संदेहास्पद है।”

 

यहां गौर करने वाली बात यह है कि कोलकाता के सेक्स वर्कर्स पिछले कई सालों से अपना विरोध दर्ज कर रहे हैं। इस पर संजीदगी से सोचने की जरूरत है। समृद्ध परम्परा वाले समाज में आखिर कहां चूक रह जाती है, जिससे किसी ख़ास तबके में असंतोष जन्म ले लेता है!

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