हालात के हिसाब से फेमिनिज़्म की परिभाषा बदल जाती है, जानिए अन्य 8 बातें

Updated on 23 Jan, 2018 at 2:13 pm

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महिला सशक्तिकरण और महिलाओं को समान मौका देने के लिए फेमिनिज़्म (नारीवाद) वक़्त की ज़रूरत है। हालांकि, आज के आधुनिक युग में कुछ लोग झूठे नारीवाद के नाम पर महिला सशक्तिकरण की मुहीम को कमज़ोर कर रहे हैं और उसे गलत दिशा देने का काम कर रहे हैं। खासतौर पर पुरुषों के मन में फेमिनिज़्म के नाम पर गलत छवि बन रही है। ऐसे फरेबी लोगों की वजह से ही फेमिनिज़्म को नुकसान पहुंचा हैं और पुरुषों के साथ ही महिलाओं के मन में भी इसकी गलत छवि बनी है। मॉर्डन फेमिनिज़्म की इन बातों के कारण ही पुरुष इसे पसंद नहीं करते है।

1. हालात के हिसाब से फेमिनिज़्म की परिभाषा बदल जाती है।

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अलग-अलग लोगों के लिए फेमिनिज़्म की परिभाषा अलग-अलग होती है। आधुनिक जमाने के नारीवादी लोग अपनी सुविधा के अनुसार इसकी परिभाषा बना लेते हैं जिस कारण ऐसे लोगों में आपस में ही विरोधाभास होता है। ये लोग खुद निश्चित नहीं कर पाते कि कौन असली फेमिनिज़्म है और कौन नहीं। फेमिनिज़्म की कोई वैश्विक परिभाषा नहीं है।

2. बड़े और गंभीर मुद्दों को छोडकर छोटे मुद्दों के पीछे पड़े रहते हैं।

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मॉर्डन फेमिनिज्म की पूरी फौज महिलाओं से जुड़े गंभीर और लिंगभेद वाले असल मुद्दों को छोटे मुद्दों की तरफ़ ज्यादा ध्यान देते हैं। ये शहर में फेमिनिज़्म की बात करते हैं, जहां लिंगभेद न के बराबर है। गांवों में यह बहुत ज़्यादा है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं की तो ये बात भी नहीं करते।

3. पुरुष विरोधी।

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महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार के लिए फेमिनिज़्म की शुरुआत हुई, लेकिन आधुनिक युग में यह महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं, बल्कि उनसे कहीं ऊचा और महान दिखाने की कोशिश करने के साथ ही पूरी तरह से पुरुष विरोधी हो गया है, जबकि नारीवादी आंदोलन का उद्देशय पुरुष विरोधी होना नहीं था, बल्कि महिलाओं को समान अधिकार दिलाना था।

4. समानता की बात तो करती हैं, मगर साथ ही सहूलियते भी चाहती हैं।

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मॉर्डन फेमिनिस्ट जहां आक्रामक नारों और आंदोलन से समान अधिकारों और स्त्री स्वतंत्रा की बात करती है, वही दूसरी ओर पुरुषों से फेवर भी चाहती हैं कि जब वो बस में ट्रेन में जाएं तो पुरुष महिला होने के नाते उन्हें सीट दें। उनका यही रवैया उलझन पैदा करता है। एक ओर तो वह समान अधिकार की बात करती हैं, तो दूसरी ओर फिर पुरुषों से सहूलियत की उम्मीद क्यों करती हैं।

5. सभी मर्दों को एक ही कैटेगरी में खड़ा करना।

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खुद को मॉर्डन नारीवादी मानने वाली महिलाएं सभी पुरुषों को एक जैसा ही समझती हैं। उन्हें लगता है कि पुरुष बस किसी महिला को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते और उसे हमेशा अपने पैरों के नीचे दबाकर रखते हैं। जबकि सच तो यह है कि कई पुरुष महिला अधिकारों के लिए बरसों से लड़ रहे हैं और वो हमेशा महिलाओं के हक के लिए उनके साथ खड़े रहते हैं।

6. स्वार्थ के लिए नारीवाद का इस्तेमाल।

 

तथाकथित नारीवादी शायद ही कभी महिला सशक्तिकरण की दिशा में कुछ करते हैं। वो तो बस अपने स्वार्थ के लिए नारीवादी शब्द का इस्तेमाल करती हैं। पीड़ित महिला होने का नाटक कर वो लोगों की सहानुभूति और बाकी सुविधाओं का लाभ उठाना चाहती हैं।

7. पुरुषों और महिलाओं के बीच जैविक (बायलॉजिकल) अंतर को स्वीकार न करना।

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ऐसे झूठे नारिवादियों की समानता की लड़ाई कई बार पागलपन की हद तक चली जाती है। अपने इस पागलपन में वो ये भी भूल जाते हैं कि पुरुषों और महिलाओं में कुछ जैविक अंतर भी है जो किसी इंसान ने नहीं बनाए, बल्कि कुदरती है। कुछ चीज़ें महिलाओं को ही शोभा देती हैं, उसी तरह कुछ बातें पुरुषों के लिए अच्छी होती है।

8. बदलाव लाने की जल्दी।

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ये आधुनिक नारीवादी समाज मे बदलाव लाने के लिए कुछ ज़्यादा ही उतावले होते हैं। दरअसल, पितृसत्ता वाले हमारे समाज में अब बदलाव शुरू हो चुका है, मगर ये धीरे-धीरे सहज गति से होगा, लेकिन मॉर्डन फेमिनिज़्म के समर्थक बहुत जल्द बदलाव लाने की कोशिश करते हैं, जिसका नतीजा खतरनाक हो सकता है।


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