ममता बनर्जी के हाथ से फिसल रहा है पश्चिम बंगाल !

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Updated on 27 Mar, 2017 at 12:58 pm

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पिछले कुछ सालों में पश्चिम बंगाल देश की राजनीति में चर्चा का विषय रहा है। पश्चिम बंगाल ने ऐसे दिन भी देखे हैं, जब इसे वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता था। बंगाल में लगातार 35 सालों तक सत्तानशीं होते रहे वामपंथी राजनीतिक दल यहां की बदौलत केन्द्रीय की राजनीति में भी खासा प्रभाव छोड़ते रहे थे। वर्ष 2011 में उनके सत्ता से विदा होने के बाद कमोवेश यही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के साथ भी रही। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में कथित परिवर्तन की लहर पर सवार होकर सत्ता के शिखर तक पहुंची अग्निकन्या ममता बनर्जी की राजनीति भी वामपंथी राजनीति के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटती रही। उद्योगों का विरोध से लेकर मुस्लिम तुष्टीकरण तक, ममता ने भी वही तरीका अख्तियार किया, जिसे अपनाकर वामपंथी राजनीतिक दल लंबे समय तक बंगाल में जमे रहे थे। परिवर्तन की बात सिर्फ नारे तक ही सीमित रही। धरातल पर वस्तुतः कहीं परिवर्तन दिखा नहीं।

अब ममता की राजनीति ही उनके लिए गले का फांस बन रही है।

indianexpress
सिंगूर आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी।

बंगाल में बढ़ रही जिहादी गतिविधियों के बीच एक के बाद एक लगातार हो रहे साम्प्रदायिक दंगों पर तृणमूल सरकार की निष्क्रियता ने ममता बनर्जी को कठघड़े में खड़ा किया है। राज्य सरकार का दावा है कि मीडिया रिपोर्ट्स झूठे हैं, सबकुछ सामान्य है। हालांकि, ऐसा है नहीं।

कोलकाता की गलियों में सबकुछ सामान्य दिखे, लेकिन सोशल मीडिया, जिसे फिलहाल समाज का आईना मानते है, पहलवानी का अखाड़ा बना हुआ है। या यूं कहिए कि यहां अघोषित युद्ध चल रहा है। अलग-अलग ग्रुप में लोग एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं। लोग मुखर हो रहे हैं। इनमें अधिकतर लोगों की संख्या ऐसी है जो वर्तमान सरकार की नीतियों से असंतुष्ट हैं। यहां ममता को डिफेन्ड करने वाले लोग भी हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है। आलम यह है कि ममता के धुर विरोधी रहे मार्क्सवादी भी अब उनका समर्थन कर रहे हैं।  श्रीजात बंद्योपाध्याय ने जब त्रिशूल को कंडोम पहनाने वाली कविता लिखी, तब उनके समर्थन में ममता बनर्जी का खुलकर आना हालांकि लोगों को रास नहीं आया। सोशल मीडिया का अघोषित युद्ध सड़क पर आने के डर से श्रीजात को तत्काल सुरक्षा मुहैया कराई गई। बाद में उनकी कविता पर संज्ञान लेते हुए खुद फेसबुक ने इसे हेट स्पीच मानते हुए हटा देने का निर्णय कर लिया था।

indiatimes श्रीजात बंद्योपाध्याय। 

संभवतः पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं।

काफी कुछ बदला-बदला दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में रामनवमी मनाने की परंपरा नहीं रही है। कुछ मठों, मंदिरों और कोलकाता के अर्थव्यवस्था की धूरी माने जाने वाले मारवाड़ी समुदाय को छोड़कर रामनवमी के संबंध में लोग कम ही जानते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां रामनवमी मनाने की परंपरा ने जोर पकड़ा है। इस बार, कोलकाता शहर के अलावा गांवों में भी रामनवमी की तैयारी बड़े स्तर पर हो रही है। अलग-अलग इलाकों में बड़ी संख्या में भगवा पताका लहरा रहे हैं। रामनवमी के अवसर पर जुलूस में शामिल होने के लिए हिन्दू समाज के लोगों का आह्वान किया जा रहा है। अब इसका क्या संकेत है, राम जानें।


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उत्तर प्रदेश चुनावों के नतीजों ने ममता को बैकफुट पर ला खड़ा किया है। वह सन्न हैं। उत्तर प्रदेश में कब्रिस्तान व श्मशान पर तर्क-वितर्क शुरू हुआ तो उन्होंने अपने विधायकों और सांसदों को सलाह दी कि वे अपने फंड से श्मशान का आधुनिकीकरण करवाएं। यहां तक कि उन्होंने एक तरह से केन्द्र सरकार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और पुराने विवादों पर मिट्टी डालने की कवायद तेज की है।

वहीं, दूसरी तरफ हाल ही में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मिली शानदार चुनावी जीत से भारतीय जनता पार्टी उत्साहित है। इस जीत से भविष्य के प्रति आशान्वित पार्टी की नजर पश्चिम बंगाल पर है, जहां लंबे समय से पैठ बनाने की जद्दोजहद जारी है। पार्टी के नेता मानते हैं कि बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर तक बदलाव के बयार का लंबे समय से इन्तजार कर रहे हैं। यही वजह है कि आने वाले दिनों में भाजपा द्वारा अपना आंदोलन तेज के संकेत मिल रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के तीन विधायक और दो सांसद हैं। बंगाल में भाजपा का आधार नहीं रहा है। हालांकि, वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में इसका वोट प्रतिशत 17 फीसदी पहुंच गया, जो अपने आप में एक उपलब्धि है। तृणमूल सुप्रीमो के भाजपा को लेकर आशंकित की एक बड़ी वजह यह भी है। इससे पहले वह इशारा कर चुकी हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करेंगी।

राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर लगाम लगाने की कवायद में ममता सरकार संघ के संस्थाओं के स्कूलों पर अंकुश लगाना चाहती है, ताकि उसकी विचारधारा न फैले। हालांकि, राज्य सरकार का यह फैसला उसके खिलाफ जाते दिख रहा है।

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