बंगाल में पिता हुए ‘अब्बा’, मां बन गईं ‘अम्मी’ और मौसी ‘खाला अम्मी’

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Updated on 12 Jan, 2017 at 3:55 pm

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पश्चिम बंगाल में पिता को बाबा नहीं, ‘अब्बा’ कहते हैं। वहीं, पिता के भाई को काका नहीं, ‘चाचा’ कहते हैं। इसी तरह, बुआ को ‘पिशी’ नहीं, फूफूअम्मा कहते हैं। और इन सभी को जिन्होंने जन्म दिया, उन्हें ठाकुरमां या ठाकुरदा नहीं, बल्कि ‘दादा’ और ‘दादी’ कहते हैं। मां को मां नहीं, बल्कि ‘अम्मा’ और मौसी को मासी नहीं, बल्कि ‘खाला अम्मा’ कहके बुलाते हैं। जी हां, इस रिपोर्ट के मुताबिक, अब पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार के सौजन्य से बच्चों को यही पढ़ाया जाता है।

राज्य के सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा में पढ़ाई जाने वाली ‘परिवेश विद्या’ नामक पुस्तक में बच्चों को अपने निकटवर्ती रिश्तेदारों के संबंध में जानकारी देने के लिए कुछ इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इसमें सानिया नामक एक मुस्लिम लड़की के परिवार की शाखाओं का वर्णन कुछ इसी तरह किया गया है।

हालांकि, अब इस पर विवाद शुरू हो गया है कि बच्चों को परिवार के बारे में समझाने के लिए मुस्लिम परिवार का ही उदाहरण देने की क्या जरूरत आन पड़ी? इस बात को केन्द्र में रखकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। खासकर फेसबुक पर।

सवाल पूछे जा रहे हैं, जब देश के शिक्षा प्रतिष्ठानों में गीता पढ़ाने पर विवाद शुरू हो गया था, तो क्या किसी धर्म विशेष का स्कूली शिक्षा की पुस्तकों में प्रचार जायज है? जब गीता की पढ़ाई को शिक्षा का भगवाकरण माना जा सकता है, तो फिर इस तरह के वाकये को शिक्षा का इस्लामीकरण क्यों न माना जाए?


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इस संबंध में पूछे जाने पर राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं कि राज्य के स्कूलों में यह सिलेबस जब लागू किया गया था, उस वक्त वह शिक्षा मंत्री नहीं थे।

पार्थ चटर्जी कहते हैंः

“यह सिलेबस जब लागू किया गया था, उस वक्त मैं शिक्षा मंत्री नहीं था। पद पर मेरे आने से पहले ही यह बदलाव किए गए थे।”

हालांकि, इस संंबंध में सिलेबस कमेटी के चेयरमैन अभीक मजूमदार को इसमें कुछ भी विवादित नहीं दिखाई देता।

गौरतलब है कि वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने परिवर्तन का नारा दिया था। परिवर्तन अब दिख रहा है, सामाजिक व्यवस्था में भी। शैक्षणिक व्यवस्था में भी।

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