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भारतीय क्रिकेट का ‘विलेन’ कप्तान, जिसने अपने फायदे के लिए रणजी ट्रॉफी को खत्म करना चाहा

Published on 26 March, 2018 at 9:40 pm By

आज के समय में भारतीय क्रिकेट टीम में आपको जगह बनानी है तो उसके लिए आपको मैदान पर परफॉर्म करना जरूरी है। अगर परफॉरमेंस खराब रहा तो किसी भी खिलाड़ी को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।


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लेकिन एक समय ऐसा भी था जब एक खिलाड़ी ने अपने खेल के बलबूते पर नहीं, बल्कि अपने रुतबे के बदौलत टीम में जगह बनाई और टीम का कप्तान भी बना।

 

 

भारत में जब क्रिकेट की शुरुआत हुई थी, उस समय भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। भारत में क्रिकेट की शुरूआत साल 1932 में हुई। उस समय भारत में राज्यों के राजा-महाराजाओं का दौर था। लिहाजा भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए किसी खिलाड़ी के बेहतर प्रदर्शन को नहीं, बल्कि किसी शख्स के रूतबे को तवज्जो दी जाती थी। ऐसे में भारतीय क्रिकेट के शुरूआती दौर में राजा-महाराजाओं और नवाबों को टीम में जगह मिलती थी।

 

 


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ऐसे ही एक खिलाड़ी विजयनगरम के राजा महाराज कुमार, जिन्हें विज्जी भी कहा जाता था, उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनने का सौभाग्य हासिल हुआ था। उन्हें ये कप्तानी अपने अच्छे प्रदर्शन की वजह से नहीं, बल्कि उनके राजा होने के कारण मिली थी। उन्हें क्रिकेट खेलने का शौक जरूर था, लेकिन वह इस खेल में पारंगत नहीं थे।

 

राजा महाराज कुमार उर्फ विज्जी indiatimes

 

28 दिसंबर 1905 को वाराणसी में जन्में विज्जी ने अपने करियर में सिर्फ 3 टेस्ट मैच ही खेले। इन तीन टेस्ट मैचों की 6 पारियों में उन्होंने महज 33 रन बनाए, जिनमें उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 19 रन रहा।

 

विज्जी ने अपना पहला टेस्ट मैच 27 जून 1936 को इंग्लैंड के खिलाफ खेला था। इसके बाद उनका अंतर्राष्ट्रीय करियर 3 टेस्ट मैचों की इस सीरीज के बाद खत्म हो गया।

 

वहीं, फर्स्ट क्लास क्रिकेट में भी वह कुछ खास नहीं कर पाए। विज्जी ने अपने पूरे करियर में  47 फर्स्ट क्लास क्रिकेट मैच खेले, जिसमें उन्होनें 73 पारियों में 18.60 की औसत से 1228 रन बनाए।

 

 

 अपने फायदे के लिए रणजी ट्रॉफी को करना चाहते थे खत्म

 

विज्जी भारत की प्रथम श्रेणी क्रिकेट प्रतियोगिता रणजी ट्रॉफी का नाम बदलकर विलिंगडन ट्रॉफ़ी कर देना चाहते थे। बता दें कि रणजी ट्रॉफी का नाम महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर रखा गया है। रणजीत एक ऐसे भारतीय बल्लेबाज़ थे, जिन्हें अंतराष्ट्रीय मैचों में खेलने का मौक़ा मिला। वह पहले भारतीय रहे, जिन्‍होंने इंग्‍लैंड की तरफ से टेस्‍ट क्रिकेट खेले। रणजीत को भारतीय क्रिकेट का जन्म दाता माना जाता है।

विज्जी का नाम बदलने के पीछे तर्क था कि रणजी ने कभी भारत के लिए क्रिकेट खेला ही नहीं। वह इंग्लैंड से क्रिकेट खेलते रहे। वे मानते थे कि लॉर्ड विलिंगडन ने रणजी से काफी ज़्यादा समय भारत में व्यतीत किया है और भारतीय क्रिकेट में उनका योगदान रणजी से ज़्यादा है। इसलिए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की घरेलू चैंपियनशिप का नाम रणजी ट्रॉफ़ी से बदलकर विलिंगडन ट्रॉफ़ी कर दिया जाए। उन्होंने तो रणजी ट्रॉफ़ी को भारत में न खेले जाने तक की बात कह दी थी, लेकिन उनकी सभी कोशिशों पर पानी फिर गया और रणजी ट्रॉफी का नाम नहीं बदला गया।

 

महाराजा रणजीत सिंह cricketcountry

 

स्पॉट फिक्सिंग से भी नहीं आए बाज

 

वह क्रिकेट के गणित नहीं जानते थे। इंग्लैंड के टूर मैचों में विज्जी का औसत पहले के मुकाबले 16.25 की औसत के साथ थोड़ा जरूर सुधरा, लेकिन ये भी विरोधी टीम की ही देन थी। दरअसल, उन्होंने विरोधी टीम के कप्तान को अपने आप को आउट न करने के लिए सोने की घड़ी तोहफे में दी थी। काउंटी कप्तान ने कहा भी थाः



 

 “मैंने उसे कुछ फ़ुल टॉस गेंदे और कुछ आसान सी शॉर्ट गेंदे फ़ेंकी थी। लेकिन आप इस तरह की गेंदें फ़ेंक कर पूरा दिन नहीं निकाल सकते, कम से कम इंग्लैंड में तो नहीं।”

 

 

भले ही विज्जी का प्रदर्शन खास नहीं था, लेकिन वह खुद को उच्च कोटि का खिलाड़ी मानते थे। वह चाहते थे कि उन्हें नाइटहुड की उपाधि से नवाजा जाए और ऐसा उनके रसूख के चलते संभव भी हो गया। 15 जुलाई 1936 को उन्हें नाइटहुड की उपाधि मिलने की तारीख तय हुई. लिहाजा वह लंकाशायर के खिलाफ़ होने वाला मैच नहीं खेल सकें।

 

इस मैच के लिए सी.के. नायडू को भारतीय टीम की कमान सौंपी गई। लंकाशायर को मैच जीतने के लिए 199 रनों की दरकार थी। विज्जी ये हरगिज नहीं चाहते थे नायडू की कप्तानी में भारत मैच जीते। इसलिए उन्होंने टीम के एक खिलाड़ी मोहम्मद निसार को संदेश पहुंचाया कि इंग्लैंड के खिलाड़ियों को केवल फ़ुल टॉस गेंदें डाली जाए।

 

इसके बाद निसार ने ऐसा ही किया। वह विरोधी टीम के खिलाडियों को ज्यादातर फुल टॉस डालने लगा। इसे निराश होकर कप्तान नायडू ने निसार को फिर दोबारा बॉल नहीं दी। भारत ने इस दौरे पर सिर्फ़ दो मैच जीते थे और ये मैच भी उनमें से एक था।

 

सी.के. नायडू cricketcountry

 

सी.के. नायडू की बेइज्जती करने वाले खिलाड़ी को दिया था खेलने का मौका

 

उस वक्त के दौर में भारतीय क्रिकेट टीम दो गुटों में बंट चुकी थी। जहां एक तरफ विज्जी को सपोर्ट करने वाले खिलाड़ी थे तो दूसरी ओर कुछ खिलाड़ी नायडू के पक्ष में थे। विज्जी अपने समर्थक खिलाड़ियों को खूब ऐश कराते थे। ख़ास दावत से लेकर मुफ्त में पेरिस यात्रा कराना इसमें शामिल हैं। एक बार तो विज्जी ने बाबा जिलानी नाम के एक खिलाड़ी को मैच खेलने का सिर्फ इसलिए मौका दिया था क्योंकि उसने ब्रेकफ़ास्ट के समय नायडू की बेइज्जती की थी।

 

लाला अमरनाथ को कर दिया था टीम से बाहर

 

1936 के इंग्लैंड दौरे के दौरान ही विज्जी का लाला अमरनाथ के साथ झगड़ा हो गया था। हुआ कुछ यूं कि अमरनाथ कप्तान विज्जी द्वारा की गई प्लेसमेंट से खुश नहीं थे। उन्होंने कई बार प्लेसमेंट बदलने को कहा लेकिन वह नहीं माने। हताश होने बावजूद भी अमरनाथ ने इस मैच 29 रन देकर 6 विकेट झटके थे।

इस घटना के बाद एक और मैच में जब टीम इंडिया बल्लेबाजी कर रही थी तब विज्जी ने अमरनाथ को बहुत नीचले क्रम में बल्लेबाजी करने भेजा। तब मैच खत्म होने में कुछ ही मिनट बचे थे। ऐसे में गुस्साएं अमरनाथ ने विज्जी पर गुस्से में जोर से चिल्ला दिए। इसे विज्जी ने अपना अपमान समझ लिया और अमरनाथ को टीम से बाहर कर भारत वापस भेज दिया। अमरनाथ को दौरा बीच में छोड़कर वापस जाना पड़ा। इसके बाद दोनों के बीच ऐसी तल्खी आई कि फिर दोबारा दोनों ने एक-दूसरे से कभी मुलाकात नहीं की।

 

 

नवाब ऑफ भोपाल की रिपोर्ट के बाद विज्जी को टीम से निकाला गया

 

अमरनाथ-विज्जी के बीच जो विवाद हुआ था, उसकी जांच के लिए Beaumont कमिटी का गठन किया गया था। जांच रिपोर्ट में विज्जी को लेकर कई बातें सामने आई। विज्जी की कप्तानी को भयंकर बताया गया। रिपोर्ट में उनके बतौर खिलाड़ी और कप्तान की क्षमता पर सवाल उठाए गए।

रिपोर्ट में लिखा था कि विज्जी को न तो फील्ड प्लेसमेंट की कोई जानकारी थी और न ही किस गेंदबाज को कहाँ इस्तेमाल करना है, इसके बारे में कुछ पता था। किस बल्लेबाज को कौन से क्रम में भेजना सही होगा, इसका भी उन्हें कोई आइडिया नहीं था। वह टीम में प्रतिभावान खिलाड़ियों के बजाय औसतन खिलाडियों को जगह दे रहे थे। ऐसे में विज़्जी से कप्तानी छीन ली गई और उन्हें टीम से निकाल दिया गया। इस मामले में अमरनाथ को निर्दोष घोषित कर दिया गया।


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विज्जी क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर भी काबिज रहे। महज 59 साल की उम्र में 2 दिसंबर 1965 को उनका निधन हो गया।

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