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यह अपनी प्रजाति का अंतिम नर गैंडा है और इसकी उदासी इंटरनेट पर खलबली मचा रही है

Published on 9 November, 2017 at 5:57 pm By

यह अंतिम नार्दन व्हाइट राइनो यानी सफेद गैंडा ‘सूडान’ की तस्वीर है। ‘सूडान’ विलुप्त होती प्रजाति का अंतिम नर गैंडा है जो केन्या के एक वन्यजीव क्षेत्र में दो मादा गैंडों के साथ रहता है। ट्विटर पर पोस्ट किए जाने के बाद से यह तस्वीर वायरल हो गई है। 


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‘सूडान’ कुछ समय पहले चर्चा में आया था, जब विलुप्त हो रहे इस प्रजाति के लिए धन जुटाने के मकसद से डेटिंग साइट टिंडर ने एक विज्ञापन निकाला था। इसके कुछ महीने बाद ही जीवविज्ञानी डेनिल श्नाइडर ने सूडान की एक मार्मिक तस्वीर को ट्विटर पर पोस्ट किया था, जिसके बाद से उदास दिखने वाले इस गैंडे की यह तस्वीर ट्विटर पर वायरल हो चुकी है।

उदास से दिखने वाला अपने प्रजाति का अंतिम नर व्हाइट राइनो. यह तस्वीर अब इंटरनेट पर वायरल हो रही है dailymail

इस तस्वीर को ट्वीट करते हुए जीवविज्ञानी डेनिल श्नाइडर ने लिखा थाः “जानना चाहते हैं कि विलुप्त होना कैसा होता है? यह अपनी प्रजाति का अंतिम सफ़ेद गेंडा है।” उनके इस ट्वीट को लगभग 36,000 बार रीट्वीट किया जा चुका है और 1000 से अधिक रिप्लाई कर लोगों ने संवेदना प्रकट की है।

क्या आप इस गैंडे की उदासी को समझ पाए?



आकड़ों के हिसाब से देखें तो 1960 तक इस प्रजाति के 2,000 से अधिक सफेद गैंडे जीवित थे। 1984 में सिर्फ 15 और आज उनमें से केवल पांच ही शेष जीवित हैं। इनमें ‘सूडान’ अकेला नर है। पर अफ़सोस 43 वर्षीय बूढ़ा हो चुका सूडान, स्वाभाविक रूप से नस्ल बढ़ाने में असमर्थ हैं। इसका मतलब यह है कि जल्द ही हम अब इस प्रजाति को विलुप्त होता हुआ देखेंगे।

डेटिंग साइट टिंडर का विज्ञापन जिसमें सूडान के लिए डोनेशन जुटाने की कोशिश की गयी है dailymail

एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले दक्षिण अफ्रीका में शिकारियों ने पिछले कुछ सालों में 1,215 गैंडों को मार दिया था, जो 2013 से 20 फीसदी अधिक है। आपको बता दें राइनो के सींग की काले बाज़ार में बहुत मांग है। एक वयस्क राइनो के सींग का वजन औसतन 1 से 4 किलोग्राम होता है। बाजार में इसकी कीमत करीब 75,000 डॉलर प्रति किलोग्राम होती है। वहीं, वियतनाम में यह मिथक है कि सींग कैंसर के इलाज में कारगर है, जिसकी वजह से काला बाज़ार में इसकी कीमत 100,000 डॉलर तक पहुच चुकी है।


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यह कहना बिल्कुल भी ग़लत नहीं होगा की पृथ्वी पर हम मनुष्य ही सबसे ‘बेदर्द जानवर’ हैं। इस तस्वीर के साथ यह बहस भी शुरू हो चुकी है कि जिस तरह से हम मानवजाति स्वार्थ और लापरवाही के कारण प्रजातियों के विलुप्ति के साक्षी बन रहे हैं, उससे क्या हम धीरे-धीरे अंत की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं, क्योंकि प्रकृति का यह नियम है कि इस पृथ्वी पर प्रजातियों की परस्पर निर्भरता ही जीवन को जन्म देती है। फिर क्या ऐसे ही प्रजातियों का विलुप्त होना प्रकृति के संतुलन को नही डगमगाएगा? आपकी क्या राय है? हमें जरूर बताएं।

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