घास की रोटी खाने को मजबूर हैं सूखे की मार झेल रहे गांव के लोग

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Updated on 11 Dec, 2015 at 4:52 pm

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आनाज़ के खाली पड़े डिब्बे, भूख से बिलखते बच्चे, सूखे की मार खा कर कमज़ोर शरीर और चूल्‍हे में पकती घास की रोटियां। यह कहानी सिर्फ़ ‘प्रसाद’ की नहीं है, बल्कि उसके जैसे ही बुलंदशहर जिले के लालवाडी गांव में रहने वाले तमाम लोगों की है, जिन्हें पेट भरने के लिए मजबूरन घास की रोटियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस घास को ग्रामीण फिकार कहते हैं। लगातार दो साल से सूखे की मार झेल रहा बुलंदशहर जिला उत्तर प्रदेश में स्थित है। इसे राज्य के अन्य 49 जिलों के साथ सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

प्रसाद कहते हैंः

“हम अमूमन फिकार को पालतू जनवरों को खिलाते हैं, लेकिन अब हमारे पास कोई और चारा भी तो नहीं है।”

फिकार गांव में पाई जाने वाली एक तरह की घास होती है, जिसे ग्रामीण सुखा कर पीस लेते हैं। फिर इसे खल-मूसल में डाल कर गूंथ कर, इसको रोटी का आकार देकर, मिट्टी के तवा पर पका लेते हैं।


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देखने में यह गाढ़े हरे रंग की होती है और स्वाद में कड़वाहट लिए, जिन्हें बच्चे बेमन से खाते हैं।

इस गांव की विवशता सिर्फ़ घास की रोटी तक ही सीमित नहीं है। भारत के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी दाल से लेकर प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। रोटी के साथ सब्ज़ी के लिए यह गांव पालक की तरह दिखने वाली पत्तियों का इस्तेमाल कर रहा है।


विकास का नारा लगाने वाले सभी दलों को कम से कम इस गांव में आना चाहिए। पर वोट मांगने नहीं और न ही विपक्षी दलों पर कीचड़ उछालने। कम से कम इसलिए की यह गांव उन्हें एक ऐसे भारत की तस्वीर दिखाता जहां सच में सोचने की जरूरत है।

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