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अलौकिक होती है बाबा विश्वनाथ के काशी की होली; भंग, रंग और गुलाल में डूबकर हो जाते हैं मदमस्त

Updated on 13 March, 2017 at 9:30 am By

खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी ।

भूत पिसाच बटोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।

बाबा विश्वनाथ अनूठे हैं और वह अनूठे तरीके से होली भी मनाते हैं। मान्यता है कि होली के ही  दिन भगवान शिव पार्वती माता को गौना कर काशी लाए। और जब महादेव ने मदमस्त होकर भूत-पिशाच के संग उत्सव मनाना शुरू किया, तो पूरा ब्रह्माण्ड उनके संग झूम उठा। देवी-देवताओं ने बाबा के ऊपर गुलाल फेंकना शुरू कर दिया। फिर तो काशी के संग, पूरे विश्व को रंगों और गुलालों से नहा ही उठना था।

आइए आज महादेव के संग भक्तों की अलौकिक होली का आनंद उठाते हैं। और भंग, रंग, अबीर, गुलाल के उन्माद में डूबकर मदमस्त हो जाते हैं।

लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के

चिता-भस्म  भर झोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।


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महादेव की होली सबसे निराली है। जब फागुनी बयार में रंग-भंग मिल जाते हैं, तो हृदय के सारे भाव मिट जाते हैं। होली के दिन महादेव न तो महादेव रहते हैं और न भक्त कोई आम इंसान। यह उत्सव सबको एक समान कर देता है। तो बस भूल जाइए सबकुछ और डूब जाइए महादेव के इस होली के उत्सव में।

गोपन-गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कौनऊ बाधा

ना साजन ना गोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।

भांग को भगवान शिव से जोड़ा जाता है। कहते हैंः ‘भांग ही के लड्डू पेड़ा, भांग ही की भाजी, भांग ही के पीवे खप्पर, भांग ही से राजी’। होली के दिन भांग की ठंडाई, भांग के मंगोड़े, पकोड़े बनवाए जाते हैं और इसे प्रसाद के रूप में भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है।



भंग के नशे में चूर महादेव किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं रखते। उनकी होली में कोई उनके साथ न भी हो, तब भी कोई फ़र्क नही पड़ता। भांग की बूटी रूपी प्रसाद पाकर हर भक्त अपने स्तर से ऊपर उठ जाता है। इसलिए भंग मिश्रित ठंडाई को भगवान भोलेनाथ का प्रसाद माना जाता है।

नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी

पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी ।।

पूरे देश में इस समय होली का रंग लोगों के सि‍र चढ़कर बोल रहा है। ये होली तब और खास हो जाती है, जब महादेव खुद अपने भक्तों के साथ होली के रंगों में सराबोर हो जाते हैं। भोले बाबा जब डमरू की अलौकिक धुन पर नाचते हैं, तो भक्तों के पांव रोके नही रुकते।


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इस पावन दिन पर बाबा की चल प्रतिमा का दर्शन भी श्रद्धालुओं को होता है। बाबा के दर्शन को पांच फुट की संकरी गलियों में हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। हर भक्त के मन में बस यही रहता है कि रंग भरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेली जाए।

भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज कै गोरी

धन-धन नाथ अघोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी ।।

सगे संबंधियों के साथ होली खेलने में तो आनंद आता ही है, अगर भगवान के साथ होली खेलने का मौका मिले, तो क्या कहने। तो बस इस बार पहुंच जाइए काशी और काशी के पावन घाटों के हवाओं में घुलता भांग निश्चित ही आपको सब कुछ भुला कर बस महादेव के इस अलौकिक होली उत्सव में थिरकने पर विवश कर देगा।

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