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बनारस की बेटियों के बनाए 302 पोस्टर्स को मिली गिनीज़ बुक में जगह, जानिए क्या थी सोच

Published on 15 January, 2017 at 6:22 pm By

ब्रश बेटियों के हाथ में थी और मौका था अपनी सोच और नज़रिए से ‘बेटियों’ को दर्शाती पेंटिंग्स बनाने का। मकसद था  तरह-तरह के रंगों से बेटियों के ज़िंदगी में इंद्रधनुष उतारने का। सच पूछिए तो बनारस की इन बेटियों ने समाज का वह आईना बना के रख दिया, जिनमें सिर्फ़ उनकी सोच और नज़रिया ही नहीं, बल्कि वो ख्वाब और उम्मीद भी झलकती है, जो इस समाज के दकनूसी मानसिकता के आगे कहीं दम तोड़ देती हैं।


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बनारस की इन बेटियों के द्वारा बनाए गए 302 पोस्टरों की सिरीज़ को अब गिनीज़ बुक में जगह मिली है। दरअसल, इन पेंटिंग्स का इस्तेमाल जागरूकता अभियान के तहत किया गया था। यह जागरूकता अभियान बनारस के ही डॉक्टर जगदीश पिल्लई द्वारा संचालित किया जा रहा है। इससे पहले 232 पोस्टरों के साथ यह रिकॉर्ड महाराष्ट्र की सागर अंजनादेवी सूर्यकांत माणे के नाम था।

पोस्टर्स की इस सिरीज़ को गिनीज़ बुक में दाखिला मिलने से कही ज़्यादा ज़रूरी है, समाज के उस परिदृश्य को बदला जाए, जहां निम्न मानसिकता लिंग-भेद का विकार रूप ले लेती है। इसका यह अर्थ नहीं कि इसके निशाने पर कोई एक जाति या समुदाय है। यह भारतीय समाज में व्याप्त स्त्री की पराधीनता के अलग-अलग रूपों को दर्शाता है। जो कहीं न कहीं इन बच्चियों के चित्रों में झलक कर हमें सोचने पर मजबूर कर देती है।

आइए आप भी देखिए गिनीज़ बुक में दाखिल श्रृंखला की चुनिंदा तस्वीरें जो उन बच्चियों की सोच और नज़रिया जो दर्शाती हैं कि ‘बेटियों को पंख नहीं, बेहतर हवा की ज़रूरत है।’

1. साधना

“बेटी पढ़ी-लिखी होती है तो पूरे घर को साक्षर करती है। लड़कों के साथ ऐसा नहीं होता, इसके बावजूद लड़कियों पर घर-गृहस्थी का काम यह बोलकर थोप दिया जाता है कि तुम्हें एक दिन ससुराल जाना है। मैने पेंटिंग में खुद को घर से किताब लेकर स्कूल के लिए निकलते दिखाया है।”

2. पूनम



“मैंने अपनी पेंटिंग में बाधा दौड़ में हिस्सा लेने वाले धावक दिखाया है। मुझे खेल-कूद पसंद है और मैं खेलों की दुनिया में नाम कमाना चाहती हूं। लड़कों की ही तरह लड़कियों को भी खेल-कूद की आज़ादी मिलनी चाहिए। मैं पहले स्कूल में कबड्डी खेलती थी, लेकिन घर देर से आने पर डांट पड़ती थी। मुझे कबड्डी छोड़नी पड़ी।”

3. नेहा

“मेरी पेंटिंग में एक लड़की, दीपक और किताब नज़र आएगी। कुल का चिराग बेटे को माना जाता है, लेकिन लड़कियां भी लिख-पढकर ज्ञान का प्रकाश फैला सकती है। मुझे अक्सर तब डांट पड़ती है, जब मैं पढ़कर देर से घर पहुंचती हूं।”

4. नेहा पटेल


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“गांव में लड़कियों के पहनावे और बाहर आने-जाने पर कई तरह के रोकटोक हैं। इसलिए मैंने अपनी पेंटिंग में मैं ख़ुद को गांव की एक लड़की की तरह दिखाया है, जो आगे चल कर स्कूल टीचर बनती है।”

5. निकिता

“मैंने किताब और कलम इसलिए बनाई कि इसकी ताक़त से लड़कियां ख़ुद को साबित कर सकती हैं। मेरा इलाका लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है। शाम-रात के वक़्त अक्सर अपनी मम्मी के साथ ही घर पहुचती हूं।”

आपको बता दें यह पेंटिंग प्रतियोगिता आठ सितम्बर को बनारस के छह अलग-अलग शिक्षण संस्थानों में संपन्न हुई थी। इस पेंटिंग प्रतियोगिता में 516 बच्चियों ने हिस्सा लिया था। इसमें से 302 चित्रों को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने चुना। इन चुने हुए 302 चित्रों को गिनीज़ बुक के नियमानुसार पोस्टर में तब्दील कर शहर भर में लगाया गया है।


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आज के समाज की गंभीर परिस्थिति को दर्शाती ये तस्वीरें सिर्फ़ एक निकिता, नेहा, पूनम, साधना नज़रिया नहीं है। बल्कि यह वो सच है जिसका सामना न जाने कितनी ही बेटियों को हिम्मत से करना पड़ता होगा, यह वह सपना जिसे मिलने का उन्हे अधिकार है। उन्हें उनके वस्त्रों से नही उनके हुनर से आंकिए।

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