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निर्वाण, मोक्ष, आस्था और विश्वास का केंद्र हैं बनारस के घाट

Published on 23 December, 2015 at 3:58 pm By

वाराणसी तीर्थयात्रियों के लिए एक स्वर्ग स्वरूप है। वाराणसी या काशी का विस्तार प्रायः गंगा नदी के दो संगमों, वरुणा नदी और असी नदी के संगम के बीच बताया जाता है। हिन्दू मान्यता अनुसार काशी में मृत्यु होने पर आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो कर मोक्ष पाती है। यहां लगभग 84 घाट हैं। तो आइए इनमें से कुछ घाटों के महत्व और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं को जानते हैं।

1. दशाश्वमेध घाट

 


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यह काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट ही स्थित है और सबसे शानदार घाट है। इससे संबंधित दो पौराणिक कथाएं हैं। एक के अनुसार ब्रह्मा जी ने इसका निर्माण शिव जी के स्वागत हेतु किया था। दूसरी कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने यहां दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। प्रत्येक संध्या पुजारियों का एक समूह यहां अग्नि-पूजा करता है, जिसमें भगवान शिव, गंगा नदी, सूर्यदेव, अग्निदेव एवं संपूर्ण ब्रह्मांड को आहुतियां दी जाती हैं। यहां देवी गंगा भी भव्य आरती की जाती है।

 

2. मणिकर्णिका घाट

 

इस घाट से भी दो कथाएं जुड़ी हैं। एक के अनुसार भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या करते हुए अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुंड का निर्माण कर दिया था। उसमें तपस्या के समय आया हुआ उनका स्वेद भर गया। जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आए, तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी।

दूसरी कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी। देवी पार्वती इससे परेशान हुईं और शिवजी को रोके रखने के लिए अपने कान की मणिकर्णिका, वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे ढूंढ नहीं पाए और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने देखी है?

प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चान्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बना कर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था। इस घाट की विशेषता ये है कि यहां लगातार अन्त्येष्टियां होती रहती हैं व घाट पर चिता की अग्नि लगातार जलती ही रहती है।


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3. सिंधिया घाट

 

सिंधिया घाट, जिसे शिन्दे घाट भी कहते हैं, मणिकर्णिका घाट के उत्तरी ओर है। यह घाट काशी के बड़े तथा सुंदर घाटों में से एक है। इस घाट का निर्माण करीब 150 साल पहले वर्ष 1830 में ग्वालियर की महारानी बैजाबाई सिंधिया ने कराया था तथा और इससे लगा हुआ शिव मंदिर आंशिक रूप से नदी के जल में डूबा हुआ है।



इस घाट के ऊपर काशी के अनेकों प्रभावशाली लोगों द्वारा बनवाये गए मंदिर स्थित हैं। यह संकरी घुमावदार गलियों में सिद्ध-क्षेत्र में स्थित है। मान्यतानुसार अग्निदेव का जन्म यहीं हुआ था। यहां हिन्दू लोग वीर्येश्वर की अर्चना करते हैं और पुत्र कामना करते हैं। 1949 में इसका जीर्णोद्धार हुआ।

यहीं पर आत्माविरेश्वर तथा दत्तात्रेय के प्रसिद्ध मंदिर हैं। संकठा घाट पर बड़ौदा के राजा का महल है। इसका निर्माण महानाबाई ने कराया था। यहीं संकठा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। घाट के अगल- बगल के क्षेत्र को “देवलोक’ कहते हैं।

 

4. मानमंदिर घाट

 

जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने यह घाट 1770 में बनवाया था। इसमें नक्काशी से अलंकृत झरोखे बने हैं। इसके साथ ही उन्होंने वाराणसी में यंत्र मंत्र वेधशाला भी बनवाई थी, जो दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा के संग पांचवीं खगोलशास्त्रीय वेधशाला है। इस घाट के उत्तरी ओर एक सुंदर बारजा है, जो सोमेश्वर लिंग को अर्घ्य देने के लिए बनवाया गया था।

 

5. ललिता घाट

 

स्वर्गीय नेपाल नरेश ने ये घाट वाराणसी में उत्तरी की तरफ बनवाया था। यहीं उन्होंने एक नेपाली काठमांडु शैली का पगोडा आकार गंगा-केशव मंदिर भी बनवाया था, जिसमें भगवान विष्णु प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर में पशुपतेश्वर महादेव की भी एक छवि लगी है।

6. असी घाट

 


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असी घाट असी नदी के संगम के निकट स्थित है। इस सुंदर घाट पर स्थानीय उत्सव एवं क्रीड़ाओं के आयोजन होते रहते हैं। ये घाटों की कतार में अंतिम घाट है। ये चित्रकारों और छायाचित्रकारों का भी प्रिय स्थल है। यहीं स्वामी प्रणवानंद, भारत सेवाश्रम संघ के प्रवर्तक ने सिद्धि पायी थी। उन्होंने यहीं अपने गोरखनाथ के गुरु गंभीरानंद के गुरुत्व में भगवान शिव की तपस्या की थी।

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