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भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं माता वैष्णो देवी, आदिशक्ति जगदम्बा की अमर कथा

Updated on 19 January, 2017 at 1:13 am By

भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली, उनके दुःखों को हरने वाली, उनकी समस्त समस्याओं को दूर करके उन्हें संसार की सभी खुशियां प्रदान करने वाली ‘शेरा वाली माता’ ‘आदिशक्ति’ वैष्णो देवी मां का मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। जम्मू में स्थित माता वैष्णो देवी की महिमा अपरम्पार है। माता वैष्णो देवी ‘त्रिकूट पर्वत’ पर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की तीन पिंडियों के रूप में विराजमान हैं।

“चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है” ‘आदिशक्ति’ वैष्णो देवी माता का मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। liveindia

‘आदिशक्ति’ वैष्णो देवी माता का मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक
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कहते हैं पहाड़ों वाली माता सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उसके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। ऐसा ही सच्चा दरबार है- माता वैष्णो देवी का जो 5,200 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान कटरा से लगभग 14 किलोमीटर दूर है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन 2 कथाओं की चर्चा अधिक होती है।

कटरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ‘माता वैष्णो देवी मंदिर’ speakingtree

कटरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ‘माता वैष्णो देवी मंदिर’ speakingtree

भगवान राम को पति मानकर की कठोर तपस्या


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हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी पर अधर्म का बोझ बढ़ने के कारण आदिशक्ति महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपने महा-तेज़ से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की।

यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट पर कई सालों से संतानहीन पंडित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कन्या का नाम त्रिकुटा रखा गया। लेकिन भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण बाद में वह वैष्णवी नाम से विख्यात हुईं। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह पता चला कि भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान राम के रूप में अवतार लिया है, तब वह उन्हें पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी।

जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वरम पहुंचे, तब उन्होंने उस कन्या को ध्यानमग्न देखा। कन्या भगवान श्रीराम को देखकर बेहद प्रसन्न हुईं और पत्नी के रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया ।

भगवान राम ने कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। हालांकि, उन्होंने आश्वासन दिया कि जब वह कलयुग  में कल्कि के रूप में अवतार लेंगे, तब उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे। भगवान राम ने वैष्णवी को कहा कि वह हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत पर जाकर तप करें।

जब श्री राम ने रावण पर विजय प्राप्त की, तब मां ने नवरात्र मनाने का निर्णय लिया। इसलिए श्रद्धालु नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

भक्त श्रीधर के कष्ट हर भैरव नाथ को प्रदान किया मोक्ष



दूसरी कथा के अनुसार कटरा से 2 किलोमीटर के अंतराल पर हंसाली नामक एक गांव है। कहते हैं कि 600 साल पहले इस गांव में श्रीधर नामक एक ब्राह्मण रहते थे, जो माता के परम भक्त थे। दुर्भाग्यवश उनकी कोई संतान नहीं थी। माता को खुश करने के लिए श्रीधर ने नौ कुंवारी कन्या पूजन के लिए समस्त ग्राम निवासियों को आमंत्रित किया।

उसी गांव के समीप भैरवनाथ का भी वास था। उसे वैष्णो माता के प्रताप से जलन थी। भैरवनाथ ने अपनी मायावी शक्तियों द्वारा श्रीधर का पूजन खंडित कर दिया और पूरे गांव में माता वैष्णो का दुष्प्रचार करने लगा।

नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को भोजन कराना बहुत ही मांगलिक कार्य है news75

नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को भोजन कराना बहुत ही मांगलिक कार्य है news75


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पूजा अपूर्ण रहने की वजह से श्रीधर घर में स्थापित की गई माता की मूर्ति के आगे दुःखी मन से विलाप करने लगे। माता से भक्त श्रीधर का दुःख देखा नहीं गया। तब उन्होंने अन्य देवियों को पुकारा, जिसके तत्पश्चात ये नौ देवियां कन्या रूप धारण कर भक्त श्रीधर के घर उपस्थित हुई और श्रीधर से कन्या पूजन पूर्ण करने को बोला।

भक्ति भाव से प्रफुल्लित होकर वैष्णो माता ने श्रीधर से कहा कि आप कल एक विशाल भंडारे के लिए समस्त ग्रामवासियों के साथ भैरवनाथ को भी आमंत्रित करिए। श्रीधर ने माता का आग्रह सहर्ष स्वीकार कर लिया।

लेकिन माता के चले जाने के बाद श्रीधर चिंता में डूब गए, क्योंकि ग़रीबी के कारण उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। फिर भी कन्या की बात सर्वोपरि रखते हुए श्रीधर नें ग्रामवासियों के साथ भैरव नाथ को भी आमंत्रित कर दिया।

धीरे-धीरे समय व्यतीत हो गया। भंडारे का समय भी समीप आ गया। सांझ का वक्त था और उसके घर में हज़ारों की भीड़ जाम चुकी थी। जो धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी। इधर, श्रीधर की भी चिन्ता बढ़ती जा रही थी, लेकिन माता का तो चमत्कार दिखना अभी बाकी था। मान्यता है कि तब माता कन्या रूप में प्रकट होकर अपने दिव्य बर्तन से सबको भोजन कराने लगी।

इधर भैरवनाथ भी भोजन के लिए विराजमान हो चुके थे। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उन्होंने मांस और मदिरा की मांग की। तब कन्या ने भैरवनाथ को समझाया उन्होंने जिन वस्तुओं की मांग की है, वे उपलब्ध नहीं कराए जा सकते। लेकिन भैरवनाथ अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, जब माता ने वायु रूप धारण कर लिया और त्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनका पीछा करने लगे।

पौराणिक मान्यता के अनुसार उस वक़्त हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। कथा है कि हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल से अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

पवित्र जलधारा ‘बाणगंगा’ जलधारा के जल को अमृत माना जाता है। tourismandfood

पवित्र जलधारा ‘बाणगंगा’tourismandfood

इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ महीने तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गई। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी और आदिकुमारी के नाम से प्रसिद्ध है। इसे गर्भजून के नाम से जाना जाता है।

पवित्र गुफा को ‘अर्धक्वाँरी’ के नाम से जाना जाता है। maavaishnodevi

पवित्र गुफा को ‘अर्धक्वाँरी’maavaishnodevi

आदिकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरवनाथ से युद्ध किया।

वैष्णो माता के पवित्र चरण maavaishnodevi

वैष्णो माता के पवित्र चरण maavaishnodevi

भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी। जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप धारण कर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है।

जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान ‘पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर मां काली (दाएं), मां सरस्वती (मध्य) और मां लक्ष्मी (बाएं) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है।

मान्यता है कि वैष्णो देवी माता से युद्ध करने के पीछे भैरवनाथ की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी। जब भैरवनाथ ने क्षमा याचना की तो वैष्णो माता ने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।


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उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गई।

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