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शहनाई का दूसरा नाम है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

Updated on 21 March, 2017 at 1:27 am By

अगर शहनाई की बात चलेगी तो यह उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बगैर पूरी नहीं हो सकती। दरअसल, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई का दूसरा नाम है। जब कभी हमारे मन में शहनाई की बात आती है तो उस्ताद की छवि मानस-पटल पर टंग जाती है।


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उस्ताद ने यह श्रद्धा और आदर सालों की रियाज और संघर्ष के बाद अर्जित किया था। उनकी जीवन-यात्रा सही मायने में काफी प्रेरक है।

बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1973 को डुमरांव, बिहार में हुआ था। उनको यह नाम दिया था, उनके दादा ने। दरअसल, जन्म के बाद जब पहली बार नन्हें बालक को दादा ने देखा तो उनके मुंह से निकला – बिस्मिल्लाह। बस, फिर क्या था। उनका नामकरण बिस्मिल्लाह कर दिया गया।

बिस्मिल्लाह खान के पूर्वज संगीत के सेवक थे। उनके पिता महाराज केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादन करते थे। शहनाई की इस अभिनव परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए महज 6 साल की उम्र में ही बालक बिस्मिल्लाह को संगीत सीखने के लिए उनके मामा के पास भेज दिया गया।

और इस तरह छोटी उम्र में ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी मां के साथ बनारस रहने आ गए। यहां शहनाई के प्रति उनके लगाव को देखते हुए उनके मामा ने यह भविष्यवाणी की थी कि बिस्मिल्लाह एक दिन शहनाई के बहुत बड़े कलाकार बनेंगे।

यह बिस्मिल्लाह खान ही थे, जिन्होंने शहनाई वादन को क्लासिकल म्युजिक की श्रेणी में ला खड़ा किया। इससे पहले इसे शादियों के अवसर पर बजाया जाने वाले मंगल वाद्य ही माना जाता था।


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उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपने बाल्यकाल से ही संगीत समारोहों में जाने लगे थे, लेकिन उनका धर्म उनके आड़े आ रहा था। दरअसल, शिया मुसलमान परिवार में जन्में होने के वजह से संगीत को लेकर कई पाबंदियां थीं। उनके मजहब में संगीत को हराम माना जाता है। ऐसे में वह देवी सरस्वती के उपासक बन गए थे और सात सुरों को नमाज के रूप में अपना लिया था। उन्होंने खुद को बेहद भाग्यशाली माना था, क्योंकिः

“प्रतिदिन सुबह को काशी विश्वनाथ मन्दिर के कपाट मेरे शहनाई की आवाज को सुनने के बाद ही खुलते हैं। जीवन में और क्या चाहिए। जब मैं गंगा किनारे बैठकर शहनाई बजाता हूं तो मुझे असीम शांति मिलती है। यह मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।”



उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने कैलकटा ऑल इन्डिया म्यूजिक कॉन्फ्रेन्स (1937) के अलावा अन्य कई कार्यक्रमों में भाग लिया था। समय बीतने के साथ ही उनका शहनाई वादन रेडियो पर बेहद लोकप्रिय हुआ।

देश के प्रथम गणतंत्र दिवस के अवसर पर उस्ताद ने लाल किले के प्राचीर से शहनाई की तान छेड़ी थी। और उसके बाद सभी गणतंत्र दिवस पर उन्होंने लाल किले पर शहनाई वादन किया। बिस्मिल्लाह पहले ऐसे संगीतज्ञ थे, जिन्हें यह सम्मान हासिल हुआ था।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को उड़ने से डर लगता था। यही वजह है कि विदेशों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में वह भाग नहीं लेते थे। भारत सरकार के मान-मनौव्वल के बाद वह वर्ष 1966 में एडिनवर्ग महोत्सव में भाग लेने के लिए तैयार हुए। वह इसे भी टालना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शर्त रख दी कि वह सरकारी खर्चे पर मक्का और मदीना की यात्रा करेंगे, जिसे सरकार ने मान लिया। इसी दौर में उन्होंने अमेरिका, यूरोप, ईरान, इराक और कनाडा सहित कई अन्य देशों के कार्यक्रमों में भाग लिया था।

उन्होंने गूंज उठी शहनाई (1959) और स्वदेश (2004) सहित कई अन्य फिल्मों के लिए भी शहनाई वादन किया था।

स्वदेश का गाना ये जो देश है तेरा अब भी हमारे कानों में गूंज उठता है।

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को अपने जीवन काल में कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा गया था। वह पहले भारतीय थे, जिसे अमेरिका के लिंकन सेन्टर हॉल में शहनाई का जादू बिखेरने के लिए आमन्त्रित किया गया था।

जीवन में इतना प्यार और बेशुमार सम्मान मिलने के बावजूद भारत के इस सपूत को अपने पांच बेटियों और 3 बेटों का परिवार पालने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और सरकार से थोड़ी-बहुत सहायता हासिल थी।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जमीन से जुड़े हुए महान व्यक्ति थे। उन्हें दाल-चावल पसन्द था। वह सायकिल रिक्शा में चलना पसन्द करते थे। अपने जीवन के अंतिम काल तक वाराणसी के पारम्परिक घर में रहे।


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उस्ताद का कहना था कि शहनाई उनकी बेगम है। उनका पहला प्यार है। उन्हें शहनाई से कुछ इस कदर प्यार था कि 90 साल की अवस्था में मौत भी उन्हें इससे जुदा नहीं कर सकी। उन्हें उनकी शहनाई के साथ विश्राम दिया गया। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के निधन पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। उन्होंने बेहद सादा जीवन जीया और भारतीय संगीत को एक नया मुकाम दिया।

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