मेजर सुजीत कुमार पंचोली: 1971 भारत-पाक युद्ध के नायक, जिन्होंने बढ़ाया देश का गौरव

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9:23 pm 21 Dec, 2016

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“हम युद्ध के साक्षी बनते हैं, अपनों की कुर्बानियों का जख्म झेलते हैं, बहादुरी पर गर्व तो जीत पर जश्न मनाते हैं। फिर युगों-युगों तक उन वीरों के अदम्य साहस की कहानियां अपने ज़ेहन में ज़िंदा रखते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि हमारे पुरखों ने किन परिस्थितियों में जीत का ताज हमारे सिर पहनाया था। लेकिन एक जंग के बाद हमने खोया क्या? शायद इसको लिखने के लिए हमारे कलम की स्याही हमेशा ही कमजोर पड़ जाती है।”

परंतु वही कलम जब किसी जंग से लौटे एक ज़ख्मी जवान के हाथों में आती है, तो उसकी पीड़ा उसके क्षिप्त-विक्षिप्त अंगों से कहीं ज़्यादा उसके अंतरात्मा में मौजूद उन चित्रों की होती हैं, जहां उसने अपने मुट्ठी भर साथियों को अपने आंखों के सामने गंवाते देखा हो।

भारत-पाक के 1971 के जंग के नायक रहे मेजर सुजीत कुमार पंचोली जब युद्ध के भयावह मंज़र से गुज़रते हैं, तो अपने मुट्ठी भर साहसी और बहादुर साथियों और वीरों को फौलाद बनाने वाली सिख रेजिमेंट की 9 वीं बटालियन के सम्मान में लिखते हैंः

“युद्ध में रणबांकुरे, इसलिए जीत में धुरंधर, फिर भी दयालु। जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल”

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कौन हैं भारत के नायक मेजर सुजीत कुमार पंचोली, जो भारतीय सीमा पर तो एक युद्ध जीत गए पर अपने ही देश से वीरगति को प्राप्त हुए साथियों के सम्मान की एक जंग हार गए?

मेजर सुजीत कुमार पंचोली मात्र 25 साल के थे, जब उन्होने 1971 के भारत-पाक युद्ध हिस्सा लिया था। वे 1968 में भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट में शामिल हुए थे। बाद में उन्हें सिख रेजिमेंट की अजेय 9वीं बटालियन में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे उन्होने गर्व के साथ स्वीकार कर लिया।  इसके बाद वर्ष 1969 में उनकी तैनाती श्रीनगर के तंगधार इलाक़े में कर दी गई।

मार्च 1971 का समय था, जब बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ाद कराने की रणनीति अपने चरम पर थी। यह वह दौर था जब पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में मुक्तिवाहिनी अपने जड़ें मजबूत कर पाकिस्तान का विरोध कर रही थी। देश पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। ऐसे में पाकिस्तान की हर नापाक चाल को कमजोर करने के लिए ऑपरेशन कैक्टस लिली शुरू किया गया। इसमें भारत को  मुक्तिवाहिनी का पूरा सहयोग भी प्राप्त था।

दिसंबर 3, 1971 को जंग की घोषणा हो गई। मेजर सुजीत कुमार पंचोली को 85 बहादुर जवानों की एक टुकड़ी के साथ पाक-अधिकृत कश्मीर के लीपा घाटी के ठंडा पाणि, नारियां हाइट्स और काइयां पर क़ब्ज़ा करने के आदेश दिए गए। लीपा घाटी  के इन पोस्ट्स पर क़ब्ज़ा करना इसलिए भी अहम था क्योंकि 1947 और 1965 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना इसी घाटी के आड़ में घुसपैठ करने में सफल रही थी। इस कार्रवाई का ऑपरेशन  कैक्टस लिली के अंतर्गत संचालन किया जा रहा था। इसका कोड नाम थ्री पिंपल्स दिया गया था।

दिसंबर के महीने में कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर 12,000 फुट से भी अधिक ऊंचाई पर यह स्थान  शरीर गला देने वाली बर्फ की चादर ओढ़े हुए था। सतह पर 20 इंच से भी अधिक मोटी परत और  -30 डिग्री तापमान मेजर सुजीत कुमार पंचोली और उनके मुट्ठी भर बहादुर ज़बांजों का हौसला परखने पर आमद थी। बिन रास्तों के पहाड़, सीमित संसाधन, हिमस्खलन और मौत का इंतज़ार करते छिपे माइन्स आने वाले ख़तरों को और ख़ूंख़ार रूप दे रही थीं।

ऐसे विपरीत परिस्थिति में दिसंबर 6, 1971 को  मेजर सुजीत कुमार पंचोली की टुकड़ी पाक अधिकृत कश्मीर  की राजधानी मुजफ्फराबाद से मात्र 13 किलोमीटर दूर दुश्मन के अहम ठिकाने नौकोट पर क़ब्ज़ा जमाने पर सफल हो गई। यह सफलता इसलिए भी टुकड़ी के पराक्रम को दर्शाती है, क्योंकि कोई संचार लाइन न होने की वजह से भारतीय सेना उन तक मदद के लिए पहुंचने में असमर्थ थी।

16 दिसम्बर सन् 1971 को युद्ध समाप्ति की घोषणा हो गई और बांग्लादेश बना। भारत की पाकिस्तान पर इस ऐतिहासिक जीत को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तान पर यह जीत कई मायनों में ऐतिहासिक थी। भारत ने 96000 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। दोनों ही देश इस विजय पर जश्न मना रहे थे। चूंकि मेजर सुजीत कुमार पंचोली को पाकिस्तान के हर संभव क्षेत्र पर कब्जा करने के आदेश दिए गए थे, इसलिए अब भी वे अपने जांबाज़ टुकड़ी के साथ संभावित पाकिस्तानी क्षेत्र में क़ब्ज़ा किए गए चोटियों पर पकड़ बनाए रख रहे थे और आने वाले ख़तरों का इंतज़ार कर रहे थे।


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हार का विषदंश झेल चुका पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ था। वह अपने नापाक इरादों से बाज़ नहीं आने वाला था। शायद उसको अब भी देश के जांबाज़ सिख रेजीमेंट के एक पराक्रमी 86 धुरन्धरों की टुकड़ी के साहस का अंदाज़ा नहीं था। युद्ध पांच महीने पहले समाप्त हो चुका था, लेकिन  मेजर सुजीत कुमार पंचोली अब भी एक जंग में थे।

3 मई, 1972 को सीज़फायर का उलंघन कर पाकिस्तानी सेना ने मेजर सुजीत कुमार पंचोली और उनकी टुकड़ी पर धावा बोल दिया। यह जंग इसलिए भी युगों तक याद करने के काबिल हो सकती है, क्योंकि मुकाबला पाकिस्तानी सेना के 1400 सिपाहियों से भारत के 86 रणबांकुरों से था।

हालांकि पाकिस्तानी सेना ने पोस्ट पर पुन: क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन अंतिम सांस तक चलने वाली इस लड़ाई में भारतीय रणबांकुरों ने पाकिस्तान के आजाद कश्मीर बटालियन के कमांडिंग आफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल हक़ नवाज़ कायानी को मौत के घाट उतार दिया। हालांकि, अफ़सोस  कि 86 रणबांकुरों को इन विपरीत परिस्थियों में तपा कर लोहा बनाने वाले शूरवीर मेजर सुजीत कुमार पंचोली को पाकिस्तानी ग्रेनेड ने बुरी तरह ज़ख्मी कर दिया।

 

तीन दिन तक सिखों की पहचान, आत्मसम्मान और गौरव की निशानी ‘पगड़ी’ बनी स्ट्रेचर और जख़्मों के लिए पट्टी, ताकि अंतिम सांस तक चली इस लड़ाई की गाथा युगों तक इतिहास में जीवित रह सके।

बुरी तरह से घायल मेजर सुजीत कुमार पंचोली को उनके ही दो सिख जांबाज़ों ने बर्फ में दबा खोज निकाला। मेजर पंचोली की वर्दी खून से लथ-पथ थी। जख्म इतने गहरे थे कि वे हिल-डुल पाने में भी असमर्थ थे। तब उनके दयालु सिख साथियों ने अपनी पगड़ी निकाल कर उस गौरवगाथा की मिशाल पेश की, जिनके लिए सिख पहचाने जाते हैं। पगड़ी से बना स्ट्रेचर और जख़्मों के लिए पट्टी उनको तीन दिनों तक जीवित रखा। यह एक चमत्कार ही था।

चौथे दिन मेजर सुजीत कुमार पंचोली को श्रीनगर लाया गया। इसके बाद तीन साल तक उन्हे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस दौरान उन्हें पांच बड़ी पीड़ादायक सर्जरी से गुज़रना पड़ा। 16 दिसंबर 1974 को युद्ध में घायल होने की अवस्था में उन्हे सम्मान के साथ सेना छोड़ना पड़ा। युद्ध में कई आंतरिक अंगो को गंवा चुके सुजीत कुमार पंचोली को सेना के पराक्रम पदक,  वॉर रिलीफ मेडल, संग्राम मेडल, पश्चिमी स्टार, समर सेवा मेडल और युद्ध में डटे रहने के लिए हाइ ऐटिट्यूड सर्विस मेडल से नवाज़ा गया। पर क्या यह उनके और उनकी जांबाज़ टुकड़ी के लिए काफ़ी था?

दरअसल नही! क्योंकि जिस अतुलनीय बहादुरी का परिचय मेजर सुजीत कुमार पंचोली और उनके मुट्ठीभर जांबाज़ सिख जवानों ने दिया था, उसको सरकार ने अनदेखा कर दिया, तो वहीं इतिहास ने भुला दिया। मेजर सुजीत कुमार पंचोली  ने सरकार को कई पत्र भी लिखे कि इस युद्ध में अपने पराक्रम दिखाने वाले सिख जवानों को उपयुक्त सम्मान दिए जाए। लेकिन उस वक़्त देश में हालात ऐसे थे कि सिखों के दमन और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा रखने वाली सशक्त महिला अपने पुत्रों के राजनैतिक लाभ पर चिंतित थीं। इस वजह से भारत के इन बेटों के सम्मान में एक बेहतर इतिहास लिखने में चूक हो गई। 

मात्र 24 साल की उम्र में एक मां अपने जवान बेटे को युद्ध पर भेज देती है। पर सच तो यह है जंग समाप्त होने के बाद भी वह परिवार एक जंग लड़ता है। यह जंग होती है, अपनो से जहां जीत कर भी आप हार जाते हैं। एक जंग होती है, बिस्तर पर पड़े उस असहाय जवान की बेबसी की, जिसके अंतरात्मा में इतनी ताक़त होती है की वह हर जन्म मां भारती के लिए एक बार फिर उठ खड़ा हो सकता है। एक जंग ही तो लड़ती है, उसकी दुर्गा रूपी धर्पमत्नी, जिसको जवाब देना पड़ता है कि उन्होंने मेजर सुजीत कुमार पंचोली को अपने जीवनसाथी के रूप में इसलिए चुना, क्योंकि वे अपने साथियों के साथ मातृभूमि की लाज बचाने में कदम से कदम साथ मिला कर आखरी ताक़त तक चले। जंग होती है उन मासूम बेटियों की आंसुओं से जो अपने फौलादी पिता के सामने नहीं निकलते।

मेजर पंचोली 1971 की जंग जीत कर भी अपने साथी सिख जवानों को सम्मान दिलाने की एक जंग हार गए। युद्ध के तोहफे में मिले जख्म ने कैंसर का रूप ले लिया था। 16 दिसंबर 2011  यानी विजय दिवस के दिन उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। मैं और समस्त टॉपयॅप्स टीम उनको तहे दिल से श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

नोट: यह लेख मेजर सुजीत कुमार पंचोली द्वारा लिखे गये तत्कालीन सरकार और अधिकारियों को पत्रों और निजी लेखों पर अर्धारित है। लेख में तमाम व्यातिगत जानकारियों की पुष्टि मेजर सुजीत कुमार पंचोली की पुत्री भाग्यश्री पंचोली ने की है। भाग्यश्री पंचोली एक योग्य वकील के साथ एक समाजसेविका भी हैं, जो जानवरों, पर्यावरण और रक्षा कर्मियों के उत्थान में सक्रिय हैं।

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