सुनामी में भी बचा रह गया था तमिलनाडु का यह मंदिर, आसपास की सभी चीजें बह गईं थीं

5:13 pm 7 Nov, 2017

Advertisement

तमिलनाडु में भगवान कार्तिकेय को समर्पित एक अनोखा मंदिर है। कन्याकुमारी से 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तूतीकोरिन जिले में स्थित तिरूचेंदूर मुरुगन मंदिर बहुत खास है। इस मंदिर की स्थापना की वास्तिविक तिथि तो किसी को पता नहीं है, लेकिन माना जाता है कि यह मंदिर हजारों साल पहले बना होगा।

इस मंदिर के निर्माण में चेरा, पांडया और चोल वंश जैसे कई राजवंशों का योगदान रहा। वर्तमान में यह शानदार मंदिर समुद्र किनारे शान से खड़ा है। आपको ये जानकर हैरानी होगी 26 दिसंबर 2004 में आई सुनामी, जिसमें भंयकर तबाही हुई थी, से भी इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। इसके आसपास की सारी चीज़ें बर्बाद हो गईं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मंदिर को कुछ नहीं हुआ। आखिर सुनामी की लहरों ने मंदिर को कोई नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया, बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है।

चलिए आज हम आपको इस मंदिर के पीछे की दिलचस्प कहानी बताते हैं।

17वीं सदी में डच भारत आए और उन्होंने अपनी कॉलोनियां बनानी शुरू ही की थी। ये लोग श्रीलंका और तमिलनाडु के दक्षिणी तटीय इलाकों पर राज करते थे।


Advertisement

अन्य औपनिवेशिक शासकों की तरह इन्होंने भी हिंदू मंदिरों को लूटा और अपने देश भेज दिया।

उस वक्त तूतीकोरिन भी डचों के कब्ज़े में था। उन लोगों ने तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर की संपत्ति और मुरुगन (कार्तिकेय) की प्रतिमा लूटा लिया।

जब वो इसे अपने देश ले जा रहे थे, भंयकर तूफान आया और उनकी यात्रा बाधित हो गई।

किसी ने कहा कि यह भगवान मुरुगन का क्रोध है और इससे खुद को बचाने के लिए उन्हें भगवान की प्रतिमा को समुद्र में फेंक देने का सुझाव दिया। माना जाता है कि प्रतिमा के समुद्र में फेंकते ही तूफान शांत हो गया और डच अपने गंतव्य तक पहुंच सके।

जहां तक इस मंदिर की बात है तो तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर भगवान मुरुगन के 6 पवित्र धामों में से एक माना जाता है। यह मंदिर भगवान मुरुगन और उनकी दो पत्नियों, वल्ली तथा दीवानाय को समर्पित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का अस्तित्व वैदिक काल से है और इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में किया गया है।

Advertisement

आपके विचार


  • Advertisement