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AIIMS में इलाज कराना किसी चुनौती से कम नहीं, जाने से पहले इसे जरूर पढ़ें

Updated on 29 January, 2017 at 10:38 am By

देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में इलाज कराना किसी चुनौती से कम नहीं है। सबसे पहले रजिस्ट्रेशन के लिए कतार में लगो, फिर अपॉइन्मेंट के लिए लाइन, फिर डॉक्टर से मिलने के लिए लाइन, फिर रेफर किए गए डॉक्टर से मिलने की लाइन। यहां से जांच लिखवाकर अब जांच के अपॉइन्मेंट की लाइन।

आप सोच रहे होंगे कि मुफ्त में इलाज के लिए इतना तो करना ही होगा, लेकिन जांच अभी बाकी है दोस्त।


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अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जैसी आम जांच सुविधाओं की तारीख अमूमन 4 महीने बाद मिलती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से एम्स में इलाज के लिए वही मरीज आते हैं, जिनकी अपने प्रदेश और स्थानीय अस्पताल से आस टूट चुकी होती है।

अब ऐसी दशा में जाहिर है कि मरीज की हालत नाजुक होगी और वह 4 महीने रुकने की स्थिति में नहीं होगा। जल्दी की दशा में मरीजों को ‘लाल पैथॉलजी’ से जांच कराने का विकल्प दिया जाता है, जहां मजबूरी में मरीजों को एक का चार देना पड़ता है। अब एक बार फिर जांच रिपोर्ट के साथ लाइन में लगकर डॉक्टर से मिलना होता है और यहां से शुरू होता है मरीज का असल इलाज।

ध्यान देने वाली बात है कि एम्स प्रशासन को पता है रोजाना 10,000 से अधिक रोगी इलाज के लिए आते हैं। फलां जांच अधिक कॉमन हैं। इस मर्ज के लोग अधिक आते हैं। इसके बावजूद लोगों के इलाज में देर होती है। जांच की मशीनों को बढ़ाने के अलावा यहां सारे काम हो रहे हैं।

ऑनलाइन अपॉइन्मेंट सिस्टम बनाने से और दूसरी जगह लोगों को बिठाकर पर्चा बनाने से बीमारी का इलाज नहीं होता, न ही लोग कम हो जाते हैं। बस उन अनपढ़-बुजुर्गों की मुश्किल बढ़ जाती है, जो बिल्डिंग्स को “लाल वाली-पीली वाली” से पहचानते हैं।

एम्स के भीतर ही अपॉइन्मेंट स्टेटस चेक करने के लिए पचास कम्प्यूटर दिख जाएंगे। उन कम्प्यूटर्स को दरअसल इसलिए लगाया गया है, जिससे गांव के किसी बुजुर्ग मरीज को पता चल सके कि वह किसी ऐरी-गैरी जगह नहीं दिल्ली के “अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान” में आया है।

भई! अपॉइन्मेंट की तारीख कम्प्यूटर पर चेक करने से वह 4 महीने से कम नहीं हो जाएगी, लेकिन दो अल्ट्रासाउंड की मशीन लगवा देते तो शायद मरीज थोड़ा पहले जांच करवा लेता।

देश का गरीब किसी दूर-दराज के गांव से इलाज की आस संजोए एम्स आता है डिजिटल इंडिया का सरकारी ढोंग देखने नहीं।



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साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाज के लिए आए मरीजों के रुकने की व्यवस्था का इंतजाम सरकार को करने के लिए कहा था, लेकिन अभी केवल 200 लोगों के रुकने की व्यवस्था है।

हालांकि, इसे व्यवस्था कहना बेमानी होगी। दिल्ली की सर्दी और गर्मी दोनों मशहूर हैं। लोग यहां आकर सड़कों पर, मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर रहने को मजबूर होते हैं। लोग सबकुछ छोड़कर सपरिवार इलाज कराने आते हैं।

इलाज एक कराना होता है लेकिन सड़क पर रहकर बीमार पूरा परिवार हो जाता है।


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अपने राज्य सरकार से उपेक्षा की मार खाए मरीज अपना सबकुछ छोड़ यहां आते हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें एहसास होता है कि बस जगह बदली है, व्यवस्था नहीं।


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गरीब होना तो गुनाह था ही, अब गरीब का बीमार होना भी गुनाह हो गया है।

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