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नजरियाः ये जो हमारा बिहार है न वो तुम्हारी सोच से बहुत ऊंचा है

Published on 13 November, 2017 at 9:56 am By

‘अनेकता में एकता’ या अंग्रेज़ी में ‘यूनिटी इन डाइवर्सिटी’ ये हम अपने देश के लिए तब से सुनते आ रहे है, जब हम पहली बार स्कूल गए थे। स्कूल के गलियारों में किसी दीवार पर लटके, तो कभी टीवी और भाषण में हालांकि, जैसे-जैसे बड़े होते गए यह एहसास भी बढ़ता गया कि यह अनेकता में एकता युक्ति भर है आज जब भारतवासियों को एक-दूसरे का उपहास उड़ाते देखता हूं तो कम से कम यह यकीन तो ज़रूर पक्का होता है


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लेख में आगे बढ़ने से पहले यह ज़रूरी है कि हम हास और परिहास या उपहास के बीच की सूक्ष्म रेखा को जान लें। हास्य रस, जीवन का श्रृंगार है चिन्तारत और तनाव युक्त मानव मष्तिष्क के लिए यह प्राण भरने का कार्य करती है हास्य बेशक़ अच्छे और बुरे हो सकते हैं, लेकिन ये मर्यादित होकर एक उचित सीमा में ही रहते हैं, जिससे सामने वाले को ठेस नही पहुंचती हास, परिहास और उपहास के बीच जो सूक्षम रेखा है, उसका ज्ञान होना अत्यावश्यक है इसीलिए कहा भी गया है कि परिहास और उपहास किसी मूर्ख का ही कार्य हो सकता है। विद्वान कभी किसी का परिहास नहीं करता। दरअसल, हास्य जोड़ने का कार्य करता है, वही परिहास से जन्मी हीन-भावना से हमेशा दूरियां ही उत्पन्न करती हैं

हाल ही में रेड्डिट वेबसाइट पर इसी तरह का एक भद्दा मज़ाक पढ़ा, जिसमें ‘एक बिहारी का स्टार्टर पैक‘ को दर्शाते हुए उसके कपड़े, जूते, बोल-चाल आदि पर परिहास गया है

ऐसा नही है देश में ‘बिहारी’ ऐसा पहला समुदाय है, जिसको कारण-अकारण ही परिहास का पात्र बनना पड़ता है मलयाली पर मल्लू, पंजाबी पर सरदार, मुस्लिम पर पाकिस्तान का नाम देकर भद्दे परिहास हम नित सुनते-सुनाते ही रहते हैं



समझ नहीं आता एक भारतीय होने के नाते हम उस परिहास से खुद को अलग कैसे कर सकते है, जिसमें अपने ही देश के एक प्रांत की खिल्ली उड़ा रहे हों? मुझे लगता है हमने अपने भद्दे परिहास से विभिन्न समुदायों की एक झूठी तस्वीर अपने मन में खींच ली है, जिसकी अकाल्पनिक अवधारणाओं की लकीर इस तरह से गाढ़ी हैं कि हम एक देशवासी होने के बावजूद एक-दूसरे से जोड़ नहीं पाते और रही सही कसर राजनीति पूरा कर ही देती है याद रहे ‘विविधता में एकता’ हमारी पहचान रही है इसलिए देशवासी होने के नाते क्या यह हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है कि इस देश के मूल्यों की रक्षा की जाए?

जाते जाते बता जाउं कि जिस बिहार को लेकर आप शर्मिंदगी महसूस करते हैं, उसकी शर्मिंदगी की वजह आपकी मानसिकता है इसने जाने-अंजाने ही सही, लेकिन ऐसी छवि आपके जेहन में उकेर दी है, जिससे आप समझ ही नहीं पाते कि यह भी भारत का अभिन्न अंग है राजा जनक, जरासंध, कर्ण, सीता, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, मनु, याज्ञबल्कय, मण्डन मिश्र, भारती, मैत्रेयी, कात्यायनी, अशोक, बिम्बिसार, भगवान बुद्ध, महावीर, शेरशाह, मखदूम शुरफुद्दीन अहमद यहिया मनेरी से लेकर बाबू कुंवर सिंह, बिरसा मुण्डा, नालंदा, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, जय प्रकाश नारायण, रामधारी दिनकर, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां, नागार्जुन, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, दशरथ मांझी जैसे कुछ नाम हैं, जिनके बिना भारत’ की कल्पना ही मुश्किल है


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हास्य जीवन में घोलते रहिए, लेकिन उस बेढब परिहास से बचिए, जो दूसरे को निम्न दिखाने के लिए अग्रसर हो। और अगली बार जब कोई बिहारी आपसे टकराए तो कम से इतना ज़रूर सीख लीजिएगा कि कैसे वो इतने परिहास-उपहास के कोड़ों को झेलने के बाद भी सौम्यता से हंसता-हंसाता अपनी धुन में आगे बढ़ रहा है।

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