केवल एक विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए 130 किलोमीटर का लंबा सफर तय करता है यह शिक्षक

Updated on 26 Apr, 2018 at 11:08 am

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देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का गिरता स्तर आज एक चिंता का विषय बन चुका है। आए दिन ऐसे उपायों पर मंथन किया जाता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके। शिक्षा को सर्वसुलभ बनाना राष्ट्रीय दायित्व है। लेकिन इस दायित्व को निभाने वाले शिक्षकों के गैर जिम्मेदाराना रवैये  के चलते आज ग्रामीण इलाकों के कई सरकारी स्कूल बदहाली के ज्वर की जपेट में हैं। सरकार की ओर से ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कोई जवाबदेही तय नहीं की जाती, जिसके कारण इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर हर दिन गिरता जा रहा है।

किसी भी बच्चे के भविष्य को सुधारने की जिम्मेदारी एक शिक्षक की होती है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में कई बार शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते दिखते है और बच्चों को पढ़ाने में रुचि नहीं दिखाते। हम सभी जानते है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली में सुधार की दरकार है, लेकिन  क्या सुविधाओं के अभाव में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन न कर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना सही है?

हालांकि, आज भी कुछ ऐसे शिक्षक हैं, जो ग्रामीण इलाकों में अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहे हैं। महाराष्ट्र के रहने वाले एक ऐसे ही  शिक्षक है रजनीकांत मेडे, जो अपनी मोटरसाइल पर धूल भरे रास्तों से होते हुए प्रतिदिन सरकारी स्कूल सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाने के लिए जाते हैं।

 

जी हां, जिस स्कूल में रजनीकांत कार्यरत है वहां सिर्फ 1 बच्चा उनसे पढ़ने आता है, जिसके लिए वो हर रोज करीब 130 किलो मीटर का लंबा सफर तय करते है।

 


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दरअसल, साल 2010 में रजनीकांत की पोस्टिंग पुणे से करीब 65 किलोमीटर दूर भोर के चंदर गांव के एक प्राथमिक विद्यालय में हुई थी, जहां सिर्फ एक ही छात्र पढ़ता था। लेकिन फिर भी उनका मनोबल कम नहीं हुआ। बीते कई वर्षों से वो हर रोज एक छात्र को पढ़ाने के लिए इस गांव में मीलों का सफर तय कर पहुंच रहे हैं। वैसे तो गांव में कई बच्चे हैं, लेकिन युवराज नाम का यह एक ही बालक स्कूल तक आता है। बदहाली का दंश झेल रहे इस गांव में पढ़ाई को लेकर लोगों के बीच किसी तरह की जागरुकता नहीं है।

 

 

इस पिछड़े गांव में बदहाली का आलम ये है कि किसी भी प्रकार की सरकारी योजना के बारे में ग्रामीणों को यहां कोई जानकारी नहीं हैं। लेकिन रजनीकांत शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझते है, लिहाजा वो प्रतिदिन कठिन रास्तों से गुजरते हुए इस बच्चे का भविष्य संवारने स्कूल तक पहुंचते हैं।

 

ये शिक्षक सरकारी स्कूलों में कार्यरत ऐसे कई शिक्षकों के लिए एक उदाहरण हैं, जो अपने कर्तव्य  में ढिलाई बरत कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं।

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