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तरकुलहा देवी मंदिर जहां चढ़ाई गई थी अंग्रेज सैनिकों की बलि

Updated on 27 May, 2017 at 7:39 pm By

तरकुलहा देवी मंदिर गोरखपुर से 20 किलोमीटर तथा चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। तरकुलहा देवी मंदिर हिन्दू भक्तों के लिए प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह स्थानीय लोगों की कुल देवी भी है। इसी वजह से तरकुलहा देवी मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ एक पर्यटक स्थल भी है।


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इस मंदिर का निर्माण डुमरी के क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह के पूर्वजों ने 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से भी पहले एक तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर की थी। ऐसी मान्यता है कि मां महाकाली के रूप में यहां विराजमान जगराता माता तरकुलही पिंडी के रूप में विराजमान हैं।

तरकुलहा देवी मंदिर में चढ़ाई जाती थी अंग्रेज सैनिकों की बलि

अंग्रेजों का बिहार और देवरिया जाने का मुख्य मार्ग शत्रुघ्नपुर के जंगल से ही होकर जाता था। जंगल के ही समीप डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह गुरिल्ला युद्ध नीति में निपुण थे। बाबू बंधू सिंह अंग्रज़ों के ज़ुल्म से आहत और आक्रोशित थे। लोगों के अनुसार क्रांतिकारी बंधू सिंह की जब भी गुरिल्ला युद्ध के दौरान अंग्रेजों से मुठभेड़ होती थी, तब वह उनको मारकर शत्रुघ्नपुर के जंगल में स्थित पिंडी पर ही उनका सि‍र देवी मां को समर्पित कर देते थे।

एक मई 1833 को चौरी-चौरा डुमरी रियासत में जन्मे बाबू सिंह इस कार्य को इतनी चालकी से करते थे कि काफी समय तक अंग्रेजों को अपने सिपाहियों के गायब होने का राज समझ में नही आया, लेकिन एक के बाद एक सिपाहियों के गायब होने की वजह से उन्हें शक़ हुआ जो जिला कलेक्टर के मृत्यु के बाद यकीन में बदल गया। इस पर अंग्रेजों ने बंधू की डुमरी खास की हवेली को जला दिया। यहां तक कि उनकी हर एक चीज का नामोनिशान मिटाने का प्रयास किया गया। इस लड़ाई में बंधू सिंह के पांच भाई अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

फांसी देने में अंग्रेज़ 6 बार हुए विफल, देवी मां करती थीं रक्षा



गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह को अदालत में पेश किया गया, जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। 12 अगस्त 1857 को  गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उन्हें 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए।

इसके बाद बंधू सिंह ने स्वयं देवी मां का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी कि मां उन्हें जाने दें।  कहते हैं कि बंधू सिंह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए। अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहां एक स्मारक भी बना है।

आज भी है इस मंदिर में बलि की परंपरा

बंधू सिंह ने अंग्रेजों के सिर चढ़ा के जो बलि कि परम्परा शुरू की थी, व आज भी चल रही है। यह देश का इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। अब यहां पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बाटा जाता है, साथ में बाटी भी दी जाती हैं।

चैत्र रामनवमी में लगता है भारी मेला


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तरकुलहा देवी मंदिर में साल में एक बार भारी मेले का आयोजन किया जाता है, जिसकी शुरुआत चैत्र रामनवमी से होती हैं। यह मेला एक महीने चलता है। यहां पर मन्नत पूरी होने पर घंटी बांधने का भी रिवाज़ है, यहां आपको पूरे मंदिर परिसर में जगह-जगह घंटिया बंधी दिख जाएंगी। यहां पर सोमवार और शुक्रवार के दिन काफी भीड़ होती है।

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