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बेंगलुरू में हुई सामूहिक छेड़खानी की घटना का संबंध सऊदी अरब से है, इसे ‘तहर्रुश’ कहते हैं

Updated on 2 September, 2017 at 5:10 pm By

बेंगलुरू में 31 दिसंबर की रात महिलाओं से हुई सामूहिक यौनाचार की घटना कोई मामूली घटना नहीं है, बल्कि इसका संबंध सऊदी अरब से है। सरेआम महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटना को सऊदी अरब में एक खेल माना जाता है, जिसका नाम है ‘तहर्रुश’। इसका शाब्दिक अर्थ है उकसाना या उत्तेजना। कुछ साल पहले तक तहर्रुश सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित हुआ करता था। लेकिन सऊदी अरब से खास किस्म की विचारधारा सलाफी इस्लाम के दुनिया भर में पैर पसारने के साथ ही यह तथाकथित खेल यूरोप से होते हुए भारत तक आ गया है।

पिछले साल जर्मनी के कोलोन शहर में नए साल के जश्न के दौरान सैकड़ों महिलाओं के सरेआम यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया था।इस घटना में पीडि़त महिलाओं में एक 18 वर्षीया किशोरी मिशेल ने टीवी पर आकर जब अपने ऊपर हुई दरिंदगी के बारे में बताया, तब कहीं जाकर दुनिया को तहर्रुश के बारे में विस्तार से पता चला था।

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कोलोन में पिछले साल नववर्ष के अवसर पर सामूहिक यौनाचार की शिकार 18 वर्षीया किशोरी मिशेल ने टीवी पर आकर इसे बयान किया।


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मिस्र सहित अरब दुनिया के कई देशों में तहर्रुश की व्यापक घटनाएं दिखती रही हैं, लेकिन अरब में वर्ष 2011 में सरकार विरोधी आंदोलनों के बाद इसमें इजाफा हुआ है।

वर्ष 2011 में मिस्र के कुख्यात तहरीर स्क्वायर पर रिपोर्टिंग कर रही सीबीएस की पत्रकार लारा लोगान को पुरुषों के एक समूह ने निशाना बनाया।

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तहरीर स्क्वायर पर तहर्रुश का शिकार हुई सीबीएस की पत्रकार लारा लोगान।

वहीं, तहरीर स्क्वायर पर इस तरह का शर्मसार करने वाला वाकया वर्ष 2014 में हुआ, जब एक महिला पर बेलगाम पुरुषों का समूह यौन हमला करते दिखा। डेली मेल की इस रिपोर्ट के मुताबिक, तहर्रुश के खेल में महिला या महिलाएं तीन तरह के घेरे के चक्रव्युह में फंसा दी जाती हैं। सबसे अंदर का घेरा औरतों से यौनाचार करता है, उनका उत्पीड़न करता है। बीच वाला घेरा दर्शक होता है और बाहरी घेरा अंदर के दोनों घेरों की सुरक्षा करता है। यौन उत्पीड़न के इस खेल में शामिल लोग कानून से साफ बच निकलते हैं, क्योंकि भीड़ अधिक होती है और उन्हें पहचानना मुश्किल होता है।

बेंगलुरू में 31 दिसंबर की रात जो कुछ भी हुआ, वह निश्चित रूप से भारत की अस्मिता पर चोट है। यह घटना बेंगलुरू की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलती है। साथ ही राजनीतिक दलों, नेताओं के रवैए से भी रूबरू कराती है, जिनकी एक मात्र प्राथमिकता येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना होता है।

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सामूहिक यौन उत्पीड़न की घटना के बाद की यह तस्वीर बेंगलुरू मीरर में छपी थी।



इन्सानियत को शर्मसार करने वाली इस घटना पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने असंवेदनशील चुप्पी साध रखी है। कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मौनी की संज्ञा देने वाले सिद्दारमैया खुद मौन हो गए हैं। उस रात आवारा कुत्तों की तरह बेंगलुरू की गलियों में अपने शिकार की तलाश में घूम रहे अपराधियों पर कार्रवाई की बात नहीं की जा रही है।

कार्रवाई की बात तो दूर, कर्नाटक के गृहमंत्री जी परमेश्वरा ने शर्मिन्दा करने वाला बयान दिया है।


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जहां तक मुख्यधारा की पत्रकारिता की बात है, तो वहां भी गहरी खामोशी है। बेंगलुरू की इस घटना को न तो दिल्ली में बैठे पत्रकारों ने तवज्जो दी है और न ही कर्नाटक की मीडिया ने। इस घटना को भी एक रूटीन खबर मानकर छोड़ दिया गया है।

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