जिस बेटी के जूडो सीखने पर परिवार ने लगाई थी पाबंदी, उसी ने देश को दिलाया पहला ओलंपिक मेडल

9:05 am 11 Oct, 2018

Advertisement

‘बुलंद हो अगर हौसले तो हर मुश्किल हो जाती है आसान’। मणिपुर की जूड़ो चैंपियन तबाबी देवी ने इस बात को सच कर दिखाया है। तबाबी देवी ने थांगजाम जूडो में ओलंपिक स्तर पर पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय बन गईं हैं। तबाबी ने महिलाओं की 44 किलोग्राम वर्ग में तीसरे यूथ ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है।

ओलंपिक में आज तक भारत को कभी भी सीनियर और जूनियर लेवल पर जूड़ो में कोई पदक नहीं मिला था, लेकिन 16 साल तबाबी ने इस खेल में देश को पहला मेडल दिलाकर परिवार के साथ ही पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। तबाबी की ये जीत इसलिए भी बहुत मायने रखती है, क्योंकि वो जिस माहौल में पली-बढ़ी हैं, वहां से इस स्तर तक पहुंच पाना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है।

बॉक्सिंग चैंपिनय मैरिकॉम के संघर्ष के बारे में तो सब जानते ही हैं, तबाबी देवी की संघर्ष भी कुछ ऐसा ही है। दोनों मणिपुर की हैं और दोनों का ही परिवार उनके खेल के खिलाफ था।

मैरिकॉम की तरह ही तबाबी ने भी परिवार से छुपकर जूडो की ट्रेनिंग ली थी। दरअसल, तबाबी का परिवार नहीं चाहता था कि वो जूडो सीखें, क्योंकि ये लड़कों का खेल है। माता-पिता चाहते थे कि तबाबी पढ़ाई पर ध्यान दे, लेकिन तबाबी के दिल में तो कुछ और ही था, इसलिए वह उनसे छिपकर जूडो की ट्रेनिंग लेती थीं।


Advertisement

बचपन से ही तबाबी निडर रही हैं, वो अपने से ब़ड़ी उम्र के लड़कों से भी भिड़ जाती थीं, हालांकि जीत नहीं पाती थी। तब उन्हें एहसास हुआ कि उनकी स्ट्रेंथ कम है इसलिए वो बड़े लड़कों से हार जाती हैं। उसके बाद तबाबी ने जूडो की ट्रेनिंग लेने का निर्णय लिया।

तबाबी ने स्कूल में जूडो की ट्रेनिंग लेनी शुरू की जिसके बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और जूडो ने उनकी पूरी ज़िंदगी ही बदल दी।

हालांकि, तबाबी का मकसद सिर्फ जूडो सीखना ही नहीं था, बल्कि इस खेल में राष्ट्रीय स्तर पर मेडल और नाम कमाना भी था। अपनी मंजिल तक पहुंचने में तबाबी का साथ दिया उनकी कोच ने। उनकी कोच ने घरवालों को समझाने की कोशिश की, मगर वो नहीं माने, लेकिन जब तबाबी ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जीते, तब उनके परिवार को अक्ल आई और फिर वो तबाबी का सहयोग करने लगे। देर से ही सही तबाबी को अपनो का साथ मिला।

हमारे देश में तबाबी जैसी न जाने कितनी लड़कियां हैं जो अपने सपनों को उड़ान तो देना चाहती हैं, मगर परिवार उनका साथ नहीं देता और उनके सपने दम तोड़ देते हैं।

 

Advertisement

आपके विचार


  • Advertisement