स्वामी जी कैसे बने ‘विवेकानंद’, जानिए इनके नाम के पीछे का अद्भुत रहस्य

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Updated on 12 Jan, 2017 at 9:21 am

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स्वामी विवेकानंद एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हें भारतीय अध्यात्म और संस्कृति को दुनियाभर में अभूतपूर्व पहचान दिलाने का श्रेय जाता है। वहीं, लंबे समय से स्वामी विवेकानंद युवाओं के प्रेरणास्रोत रहे हैं। उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है कि कोई उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता।

आज के युवा अगर उनकी बताई गई एक भी बात पर अमल कर लें, तो यक़ीनन वह जीवन को एक सकारात्मक रूप से देखने का सलीका सीख सकेंगे और अपने बेहतर भविष्य के साथ ही देश को उन्नति के पथ पर ले जाने सक्षम होंगे।

आज से दशकों पहले जो हिंदुस्तानी संस्कृति की तासीर, वसुधैव कुटुम्बकम की अलख स्वामी विवेकानंद ने जलाई थी, वह आज भी युवाओं को अच्छे कर्मयोग को प्रेरित करती है।

12 जनवरी, सन 1863 को जन्मे स्वामी जी का असल नाम नरेंद्र दत्त था। अपने बाल जीवन से ही उनमें परमात्मा को पाने की प्रबल लालसा थी। वह रामकृष्ण परमहंस से एक बार तर्क-वितर्क करने के उद्देश्य से उनसे मिलने पहुंचे, मिलने के पश्चात उन्हें अभूत आत्म-साक्षात्कार हुआ और वह रामकृष्ण परमहंस के सिद्धांतों और विचारों से प्रभावित हो, उन्हें अपना गुरू मानने लगे।

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स्वामी जी का राजस्थान के राजपुताना और विशेषकर खेतड़ी से एक प्रमुख संबंध रहा है। उन्हें विवेकानंद का नाम राजपुताना के खेतड़ी में मिला।

प्रसिद्ध फ्रांसिसी लेखक रोमां रोलां ने अपनी किताब “द लाइफ ऑफ़ विवेकानंद एंड द यूनिवर्सल गोस्पल” में लिखा है कि साल 1891 में भारत का प्रतिनिधितत्व करते हुए शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में जाने से पहले खेतड़ी के राजा अजीतसिंह के आग्रह पर स्वामीजी ने ‘विवेकानंद’ नाम स्वीकार किया था।



इस विश्व धर्म सम्मलेन में जाने के लिए राजपूताना के खेतड़ी नरेश ने ही पूरा खर्चा उठाया। वहीं, रामकृष्ण मिशन की स्थापना में भी उनका अहम योगदान रहा है। राजा ने जन-जन में आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन की अलख जगाने में स्वामी जी की मदद की।

25 वर्ष की उम्र में ही गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले स्वामी जी को उनकी अमेरिका यात्रा के दौरान राजा ने रेशम के वस्त्र दिए। जो बाद में जाकर आजीवन स्वामीजी का गणवेश बना।


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