निराले व्यक्तित्व के धनी थे सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, कठिन परिस्थितियों में बनाई अपनी पहचान

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Updated on 21 Feb, 2017 at 3:03 pm

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आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे मजबूत स्तम्भों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म साल 1896 में 21 फरवरी को हुआ था। एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कोई उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उनकी रचनाएं जीवन के प्रारूपों की अनुभूति कराती हैं।

निराले व्यक्तित्व के धनी थे सूर्यकांत त्रिपाठी, हिंदी साहित्य में विशेष स्थान

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तीन वर्ष की उम्र में सिर से मां का साया उठ गया, कठिन परिस्थितियों में खड़े होकर बनाई अपनी पहचान

निराला जी की जीवनी पर एक नजर डालें तो उनकी जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही है। जब निराला तीन साल के थे, उनके सिर से मां का साया उठ गया और 20 साल की उम्र में ही पिता का देहांत हो गया। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी का बोझ निराला जी के कंधों पर आ गया। वह इस दुःख से संभले ही थे कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद फैली एक महामारी में अपनी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई तथा भाभी को गंवा दिया।

लेकिन किसी भी विषम परिस्थिति को उन्होंने अपने पर हावी नहीं होने दिया।

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एक बेहद की सामान्य परिवार में जन्में निराला के पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। निराला जी ने अपनी स्कूली शिक्षा हाईस्कूल तक ग्रहण की। उन्हें कई भाषायों का ज्ञान लेना पसंद था। उन्होंने घर पर ही हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। शुरू से ही वह रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे।

अनामिका’, ‘परिमल’, ‘गीतिका’, ‘द्वितीय अनामिका’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’, ‘बेला’, ‘नए पत्ते’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’, ‘गीत कुंज’, ‘सांध्य काकली’ और ‘अपरा’ निराला जी के काव्य-संग्रह हैं। ‘अप्सरा’, ‘अल्का’, ‘प्रभावती’, ‘निरुपमा’, ‘कुल्ली भाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ उनके महान उपन्यासों में है।



उनकी प्रचलित कहानियों के संकलन में ‘लिली’, ‘चतुरी चमार’, ‘सुकुल की बीवी’, ‘सखी’ और ‘देवी’ शुमार है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने निबंध भी लिखे जो ‘रवीन्द्र कविता कानन’, ‘प्रबंध पद्म’, ‘प्रबंध प्रतिमा’, ‘चाबुक’, ‘चयन’ और ‘संग्रह’ नाम से प्रकाशित हुए। इतना ही नहीं पुराण कथा तथा अनुवाद के क्षेत्र में भी उन्होंने विशेष कार्य किया। दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथों का आपने हिन्दी में अनुवाद किया।

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इलाहाबाद से निराला जी का विशेष लगाव था। इसी शहर के दारागंज मुहल्ले में अपने एक मित्र, ‘रायसाहब’ के घर के पीछे बने एक कमरे में 15 अक्टूबर 1971 को उन्होंने अन्तिम सांस ली।

‘निराला’ सचमुच निराले व्यक्तित्व के स्वामी थे। निराला का हिंदी साहित्य में विशेष स्थान हैऔर आने वाले युगों-युगों तक रहेगा।

 


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