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“खतना प्रथा है निजता का उल्लंघन, महिलाओं के साथ होता पशु जैसा व्यवहार”

Published on 31 July, 2018 at 5:49 pm By

तमाम तरह के विरोध के बावजूद भारत समेत दुनिया के कई देशों में खतना प्रथा आज भी जारी है। हालांकि, भारत सरकार और देश की सर्वोच्च अदालत इस प्रथा के खिलाफ है। भारत में मुसलमानों के एक छोटे से समुदाय बोहरा में महिलाओं का खतना यानी उनके जननांग के बाहरी हिस्से क्लिटोरिस को रेज़र ब्लेड से काट देने का चलन मौजूद है। बच्चियों के साथ प्रथा के नाम पर की जाने वाली ये कृति दुनियाभर के कई देशों में की जाती है।


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खतना मासूम बच्चियों का किया जाता है। कई मामलों में बच्चियां खतने के दर्द को नहीं सह पातीं और अत्यधिक खून बह जाने की वजह से उनकी सेहत के लिए गंभीर स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। यही वजह है कि अब महिलाओं के खतने के विरोध में आवाजें उठ रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता बताई है। इसके बावजूद आज भी कई जगहों पर महिलाओं का खतना (Female Genital Mutilation) किया जाता है। खतना को मानने वाले समुदायों के अनुसार, महिलाओं का खतना करने से उनमें सेक्स की इच्छा को खत्म किया जाता है। इस प्रक्रिया से उनका चाल-चलन नहीं बिगड़ता और वो अपने पति के प्रति ज्यादा वफादार रहती हैं।

 

 

इस क्रूर परंपरा पर दुनिया के बहुत से देशों में प्रतिबंध है और भारत समेत कई देशों में खतना पर पाबंदी की मांग और बहस जोरों से चल रही है।

 

हाल ही में दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं का खतना करने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ये मामला महिला की निजता और गरिमा से जुड़ा है।


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खतना के विरोध में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस खतना की प्रथा को संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। मामले पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविल्कर व डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने सुनवाई की।

 

इस मसले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का जीवन केवल शादी और पति के लिए नहीं होता है। शादी के अलावा भी महिलाओं के कई और दायित्व होते हैं। साथ ही ये भी कहा है कि यह लैंगिक संवेदनशीलता का मामला है और ऐसा किया जाना स्वास्थ्य ने लिए हानिकारक हो सकता है।

 

 

खतना की प्रथा को कोर्ट ने अनुच्छेद 21 सहित अनुच्छेद 15 का हनन बताया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब आप किसी महिला के लिए सकारात्मक ढंग से सोचते हैं तो अचानक इस प्रक्रिया को उलट नहीं सकते। ये प्रथा सिर्फ किसी वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि लिंग के खिलाफ है। ये प्रथा अनुच्छेद 21 मे दिये गए स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का हनन है। किसी महिला से ही ऐसी अपेक्षा क्यों की जाती। कोर्ट ने माना कि इस तरह का एक्ट एक औरत को आदमी के लिए तैयार करने के मकसद से किया जाता है, जैसे वो जानवर हों।

 

वहीं, केंद्र सरकार भी सुप्रीम कोर्ट में खतना पर अपना विरोध जता चुकी है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करती है।

 

 

दरअसल, दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में नाबालिग लड़कियों की ‘खतना प्रथा’ के खिलाफ कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। केंद्र सरकार ने भी इन याचिकाओं का समर्थन किया है। याचिकाकर्ता की वकील इंदिरा जयसिंह ने अपनी दलील में कहा कि किसी भी आपराधिक कृत्य को इस आधार पर इजाजत नहीं दी सकती कि वह प्रैक्टिस का हिस्सा है। उन्होंने अपनी दलील में साफ कहा कि प्राइवेट पार्ट को छूना पॉस्को एक्ट के तहत अपराध है।


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यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में सालाना 20 करोड़ महिलाओं का खतना होता है। इनमें आधे से ज्यादा सिर्फ मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया में होते हैं। आंकड़ों के मुताबिक जिन 20 करोड़ लड़कियों का खतना होता है, उनमें से करीब साढ़े चार करोड़ बच्चियां 14 से कम उम्र की होती हैं। इंडोनेशिया में आधी से ज्यादा बच्चियों का खतना हो चुका है।

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