स्वच्छ भारत अभियान को साकार कर रही ये विदेशी महिला

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Updated on 11 Oct, 2016 at 4:12 pm

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भारत में हर साल लाखों लोग साफ़-सफाई और हाइजीन के अभाव से पनपी बीमारियों के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इसका बुरा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है, क्योंकि हर साल हम करोड़ों डॉलर्स इन बीमारियों से लड़ने में खर्च कर देते हैं। इसी वजह से 2014 में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 125 करोड़ भारतवासियों के सामने साल 2019 तक भारत को पूर्णतया ‘स्वच्छ’ करने का लक्ष्य रखा था और इसे अपनी पहली प्राथमिकता भी बताया।

स्लमडॉग मिलेनियर से मिली प्रेरणा

साल 2008 में रिलीज हुई फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म ने भारत में आर्थिक विषमता से उत्पन्न सैनिटेशन मैनेजमेंट की नाकामी को बड़ी निर्ममता से परदे पर प्रदर्शित किया। जिससे समाज का एक वर्ग इस बात से काफी नाराज भी हुआ की फिल्म में जानबूझकर भारत की विश्वपटल पर छवि खराब करने का प्रयास किया गया। हालांकि, हमने तब भी कोई ‘आत्ममंथन’ नहीं किया और खुद को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

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स्वच्छता अभियान की सार्थक मुहिम

परन्तु ऑस्कर जीतने वाली इस फिल्म ने अमेरिका के बोस्टन प्रांत की पेशे से डेंटिस्ट और वकील एरिन जैकिस को खासा प्रभावित किया। उन्होंने इससे प्रेरित होकर लोगों को ‘अस्वच्छता’ के तिलिस्म से निकालने का बीड़ा उठा लिया। उन्होंने सबसे पहले इसकी शुरुआत थाईलैंड से की, जहां उन्होंने पाया की करोड़ों की आबादी आज भी ‘साबुन’ के उपयोग से मरहूम है। कमोबेश यही स्थिति भारत सहित अन्य दूसरे एशियाई देशों की भी थी।

भारत में की ‘सुंदरा’ की शुरुआत

आर्थिक राजधानी मुंबई से उन्होंने ‘सुंदरा’ नाम के NGO की शुरुआत की, जिसका काम गरीब बच्चों को मुफ्त में साबुन बांटना है। इसके लिए उन्होंने नए साबुन खरीदने के बजाय होटलों में उपयोग में लाए जाने वाले साबुन, जिसे तुरंत उपयोग करके फेंक दिया जाता है, को रिसाइकल करने का आइडिया खोज निकाला। इसके तीन फायदे हुए। पहला वेस्टेज सोप मटेरियल का सही उपयोग किया गया। दूसरा इन साबुनों को उन बच्चों तक पहुंचाया गया, जिनकी क्रय शक्ति इतनी नहीं की वे साबुन को अपनी किट में शामिल कर सकें। और तीसरा ये कि इससे बच्चों में अपने स्वास्थ्य और हाइजीन के प्रति अवेयरनेस की भावना विकसित हुई।



अकेली नहीं है एरिन

इस काम में एरिन अकेले नहीं, बल्कि उनका साथ देने के लिए कई स्थानीय महिलाएं इसमें जुड़ी हुई हैं। इसे हम स्टार्ट अप से भी जोड़कर भी देख सकते हैं। यह एक बेहद सकारात्मक प्रयास रहा जिसमें ‘सुंदरा’ और एरिन दोनों काफी सफल भी रहे। उन्होंने मुंबई के बड़े-बड़े होटलों से इस क्रांतिकारी प्रयास में सहयोग की अपील की, जिसमें लगभग सभी बड़े होटलों ने अपना योगदान दिया। आज एरिन और उनका NGO ‘सुंदरा’ गुजरात और महाराष्ट्र के कई इलाकों और स्कूलों में साबुन फ्री में बांट रहा है और उन्हें स्वच्छता के प्रति जागरूक कर रहा है।

इस कहानी से मिलती है यह सीख

26 वर्षीया एरिन की इस प्रेरणादायी कहानी से हम दो सीख ग्रहण कर सकते हैं। पहला तो यह कि छोटा प्रयास भी अगर सच्चे मन और लगन से किया जाए तो सफल अवश्य होता है। और दूसरा कि हम अकेले पूरे देश को तो नहीं बदल सकते, पर खुद को बदल कर देश को बदलने के लिए प्रेरित अवश्य कर सकते हैं।

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