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मानवता की मिसाल हैं सुदर्शना देवी; जुराबें बुनकर पाल रही अनाथ बेसहारा बच्चों को

Published on 4 February, 2016 at 6:02 pm By

हम सबमें एक जैसे ही पांच तत्व हैं। भेद सिर्फ़ हमारे हृदय में हैं और इस बात का ज्ञान जब हम मनुष्यों को हो जाता है, तो मानवता की राह पर अग्रसर हो जाते हैं। अपने नाम के ही अनुरूप मनाली की ‘सुदर्शना देवी’ ने जो मानवता की खूबसूरत मिसाल पेश की है वह वाकई वैर, निंदा, नफरत, अविश्वास आदि से भरे समाज़ के लिए रोशनी दिखाने योग्य है।

अनाथ बच्चों को मां का प्यार

सुदर्शना देवी अनाथ बच्चों को मां का प्यार देती हैं। वह जब भी किसी अनाथ बच्चे को भीख मांगते देखती हैॆ, तो उनका दिल भर आता है। आज उनका घर आश्रम में तब्दील हो चुका है। 2004 से लेकर अब तक वह करीब 22 अनाथ बच्चों को उनके बेहतर भविष्य के लिए निःस्वार्थ पालन-पोषण कर चुकी हैं।

बेचने पड़े गहने पर किसी के सामने हाथ नही फैलाया


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तमाम मुश्किलों के बावजूद सुदर्शना देवी ने कभी हार नहीं मानीं। उन्हें मुफिलिसी का वह दौर भी देखना पड़ा, जब बच्चों के बेहतरी के लिए अपने गहने तक बेचने पड़े थे। यहां तक वो सब्ज़ी मंडी जा कर बची हुई सब्ज़ियां बटोर कर खिलाती थीं, लेकिन कभी बच्चों को भूखा नही सोने दिया।

जुराबें बुनकर रखी बच्चों के भविष्य की नींव

सुदर्शना देवी समाज के लिए उम्मीद की मशाल बनी हुई हैं। सरकार और प्रशासन से जहां उम्मीद होती है कि मानवता के रक्षकों की मदद करे, सुदर्शना के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। मदद करने की बजाय उल्टा मुश्किलें बढ़ा दी।

अनाथ बच्चों को पालने वाले घर को जिला प्रशासन ने अनाथ आश्रम माना और पंजीकरण न होने पर बच्चों को उठाकर ले गया। जिला प्रशासन बच्चों को सरकारी अनाथ आश्रम ले गया, लेकिन बच्चे फिर सुदर्शना के पास लौट आए।



सरकार और प्रशासन की उदासीनता के बावजूद सुदर्शना का ज़ज़्बा टूटा नहीं। शुरू में जहां रात भर जुराबें बुनकर सुबह सड़क पर बेचती थी, अब अन्य महिलाएं भी इस सहयोग में जुड़ चुकी हैं। इन जुराबों को बेचकर जो भी कमाई होती है, उन्हें बच्चों की अच्छी शिक्षा के उपर खर्च किया जाता है।

माता-पिता से मिली प्रेरणा

52 साल की सुदर्शना अपने माता-पिता को अपना आदर्श मानती हैं। वह याद करते हुए कहती हैं कि उन्हें समाज कल्याण का हौसला उनके परिवार से मिलता है। सुदर्शना बताती हैं कि एक बार मां को जेवर खरीदने के लिए पिता ने 250 रुपए दिए थे, तो मां जेवरात की बजाय पाइप खरीद लाईं। उस पाइप की मदद से सुदर्शना ने अपने गांव थरमाहण तक पानी पहुंचाया।

यही नहीं सुदर्शना के भाई ने गांव के नौजवानो को साथ लेकर गांव तक सड़क का निर्माण भी कराया है।


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क्या कहना चाहेंगे आप इस मानवता की देवी के बारे में?

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