सरकारी स्कूलों की छोरों की ये विशेषतायें आपको जरूर जाननी चाहिए

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Updated on 30 Dec, 2015 at 12:10 pm

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बाली उमरिया में मेरा बाल मन अक्सर सोचता था कि ये टॉपर और मेरिट वाले बन्दे कॉन्वेंटो के ही क्यों होते हैं? कैसे इतने अपडेटेड होते हैं? गवर्मेन्ट और अन्य लोग तो कहते हैं की बेस्ट मास्टर हमें ही पढ़ाते हैं, फिर भी हमारे लिए ‘फुकरे’ जैसे रूपक से हम ही लैस क्यों रहते हैं? समय के साथ समझ आया की सरकारी स्कूलों के छात्र दरअसल स्वभाव से मूरख और आउटडेटेड नहीं होते, बल्कि “सरकारी तंत्र” उन्हें अल्पशिक्षित और और कौशलविहीन बना देता है।

खैर ये सब तो व्यर्थ कथा, कहानी और किस्से हैं, जिससे कुछ सार नहीं निकलने वाले हैं। परन्तु इन सारी विसंगतियों के बावजूद सरकारी स्कूली छोरे होते बड़े कमाल के हैं। इन 13 बिंदुओं को पढने के बाद आपको भी ऐसा लगेगा।

1. दरअसल कान्वेन्ट के छोरे जब भी सरकारी पदों पर जाते तो उन्हें एडजस्ट होने में बड़ा समय लगता है, जबकी ये सरकारी छोरे सरकारी तंत्र की अच्छी समझ रखने के कारण तुरंत ही समन्वय स्थापित कर लेते हैं।

टूटी इमारतों और बेंचों से पुराना लगाव उन्हें काफी हेल्प करता है।

2. सरकारी स्कूलों में पढने वाला छात्र विशुद्ध देसी होता है। आप उसे किसी भी क्षेत्रीय मुद्दे पर बेहद संवेदनशील होते देख सकते हैं।

3. सरकारी स्कूल के छात्र की साइकिल की स्पीड एक हार्डले-डेविडसन को भी टक्कर दे सकती है।

4. ये रिसर्च का विषय हो सकता है कि नर्वस होकर आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में सरकारी स्कूलों के छात्र/छात्राओं का प्रतिशत बहुत कम होता है।

क्या आपको नहीं लगता की बच्चों पर परफ़ॉर्मेन्स का दबाव न डालने के लिए इन स्कूलों की व्यवस्था को सम्मानित किया जाना चाहिए?

5. सरकारी स्कूलों में लड़के-लड़कियों की बेंचें अक्सर दूर-दूर होती हैं। और भी ऐसे कई कारक आस-पास मौजूद रहते हैं, जिससे अक्सर बच्चे को-एजुकेशन का सुख लेने से वंचित रह जाते हैं।

इसलिए मन में प्रेमांकुर भले ही फूट जाए पर उसके विकास की संभावनाएं न्यून होती हैं।

6. इन स्कूलों के विद्यार्थी अमूमन स्वभाव से थोड़े ‘सरकारी’ होते हैं। मसलन अक्सर स्कूल प्रबंधन छात्रों को ‘समय प्रबंधन’ के लिए सम्मानित करता रहता है।

7. सरकारी स्कूलों के लड़के अपनी मातृभाषा के बड़े समर्थक होते हैं। मतलब आप उनकी भाषा में देसीपना आराम से देखा जा सकता है।


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भले ही आईएएस ही क्यों न बन जाएं पर अंग्रेजी से दस कदम की दूरी अवश्य बनाते दिखाई देंगे।

8. यहा के छात्रों की अत्यल्प मात्रा ही IIT और मेडिकल कालेजों में देखी जा सकती है। ऐसा माना जाता है की इन संस्थानों की ज्यादातर सीटें कॉन्वेंटों के लिए नैतिक रूप से आरक्षित होती हैं।

सरकारी स्कूल के लौंडों में व्यवहारिक जीवन की बेहद समझ होती है। बेशक वो किताबों को ज्यादा महत्व न दें पर अनुभवों में उनका कोई सानी नहीं।

9. छात्रों को अक्सर स्कूलों के प्रति लगाव बहुत कम होता है। आपने सुना होगा की स्कूल प्रबंधन ‘खाने के बहाने’ बच्चों को स्कूल बुलाता है।

फिर भी पता नहीं ऐसा क्या होता है की बच्चे स्कूल से बिचके रहते हैं।

10. आज के ज़माने में सिर्फ सरकारी स्कूलों में ही छात्रों द्वारा ‘गुरुसेवा’ देखी जा सकती है।

छात्र अपने गुरुजनों का आदर तो बहुत करते हैं। यह अलग बात है कि गुरुजन उन्हें ज्ञान देने में अक्सर कंजूसी कर जाते हैं।

11. ये छोरे भले ही वीडियो गेम और फुटबाल में कमजोर हो,पर गिल्ली-डंडे और क्रिकेट में सबसे बड़े खिलाड़ी ये ही साबित होते हैं।

12. क्लास टाइम में गोलगप्पे खाना इतना आसान नहीं होता है! यह कृत्य सिर्फ सरकारी स्कूल वाले ही कर सकते हैं।

वैसे कक्षाओं में ज्ञान की बारिश यदा-कदा ही होती है ! फिर भी छात्रों के ऐसे साहस को दाद दिए बिना रह भी कैसे सकते हैं।

13. इन छात्रों से ‘संतोषम परम सुखं’ की शिक्षा ली जा सकती है, क्योंकि उन्हें ज्यादा नंबरों और सुन्दर भवनों की ज्यादा अभिलाषा नहीं होती।

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