ऐसे रचा गया था भारत का राष्ट्रगीत वंदे मातरम्

Updated on 19 Aug, 2017 at 2:59 pm

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भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा की गई थी। उन्होंने 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में इस गीत की रचना की थी। वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में थे।

कहा जाता है कि चिन्सुराह के इसी घर में वंदे मातरम गीत की रचना की गई थी।

वर्ष 1870 के दौरान अंग्रेज हुक्मरानों ने ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचंद्र चटर्जी को बहुत ठेस पहुंची और उन्होंने 1876 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया ‘वंदेमातरम्’। शुरुआत में इसके केवल दो पद रचे गए थे, जो केवल संस्कृत में थे।

इस गीत का प्रकाशन वर्ष 1882 में बंकिमचंद्र के उपन्यास आनंद मठ में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस उपन्यास में यह गीत भवानंद नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है।


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आजादी के आंदोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश हुकूमत ने इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मोहम्मद खान ने उर्दू में अनुवाद किया।

‘वंदेमातरम्’ का स्थान राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था।

वर्ष 2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक सर्वे में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और बीबीसी के अनुसार 155 देशों के लोगों ने इसमें मतदान किया था। इस सर्वेक्षण में उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था.

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