व्यापारी, काफिला और पीला रुमाल.. कहानी 931 हत्याएं करने वाला बेहराम ठग की

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1:38 pm 28 Sep, 2018

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व्यापारी, काफिला और पीला रुमाल… यह कहानी है ऐसे ठग की , जिसके किसी रास्ते पर गुजरने मात्र से कोसों दूर तक इंसान क्या इंसानों की परछाई तक मिलनी बंद हो जाती थी। एक ऐसा ठग जिसकी नज़र पड़ते ही सौदागरी करने जाते व्यापारी, लखनऊ की रईस खूबसूरत तवायफें, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई–नवेली दुल्हनें या फिर  इलाहाबाद और बनारस के लिए निकले तीर्थयात्री, सब के सब बीच रास्ते से ही गायब हो जाते थे।

यह कहानी है ‘बेहराम’ नाम के एक ऐसे ठग की जिसके कुख्यात कारनामे मानवीय इतिहास में उसे सबसे ‘बेरहम’ ठग ठहराते हैं। इतना बेरहम कि उसने अपनी जिंदगी में महज एक पीले रुमाल से 931 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

 

कौन था बेरहाम ठग ?

साल  1765 में जन्मा बेरहाम ठग सन् 1790 में ठगी की दुनिया में कदम रखा था। शुरुआती 10 साल में ही उसने इतनी हत्याओं को अंजाम दे दिया था कि उसका नाम खौफ का पर्याय बन गया। वह अपने पास हमेशा पीले रंग का रेशम का एक रुमाल रखा करता था। जिसमें एक सिक्का होता था, जिसे गले में फंसाकर वह मुसाफिरों की हत्या करता और उसका सामान लूट लेता। उसने पीले रुमाल के जरिए गला घोंटकर 900 से अधिक लोगों की हत्या की थी। इस वजह से कुख्यात बेरहाम ठग का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज़ है।


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बेहराम ठग का दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक इस कदर खौफ था कि लोगों ने इस रास्ते से चलना बंद कर दिया था।

ठग बेहराम के बारे में कहा जाता है कि वो जहां से गुज़रता था वहाँ लाशों के ढेर लग जाते थे। बेहराम ठग के बारे में और अधिक जानने के लिए ज़रूरी हैं कि इतिहास के उन पन्नो को पलटा जाए जहाँ ख़ौफ़ को इसके नाम का पर्याय समझा जाता था। यह कहानी उस युग (1765-1840) की है जब मध्यकाल भारत में मुगल काल का सूरज अस्त हो रहा था और ईस्ट इंडिया कंपनी देश में अपने पांव पसार रही थी। उस वक़्त कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी ब्रिटिश पुलिस के लिए बड़ी तादाद में रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो रहे व्यापारी सिर दर्द का सबब बन गये थे।

 

ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी मंज़िल तक नही पहुंच पा रही थी

दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई ऐसा दिन नही गुजरता था जब कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़, मुर्शिदाबाद  के व्यापारियों के काफिले की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ ना हो। पुलिस की फाइलें लगातार गायब हो रहे लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं। लगातार हो रही इन वारदातों से अंग्रेज अफसरों के हाथ-पांव फूल गये थे। ख़ौफ़ का आलम यह था कि छुट्टी से घर लौट रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी मंज़िल तक नही पहुंच पा रही थी। हैरत की बात यह भी थी कि गायब हो रहे इन लोगों की लाश तक बरामद नही होती थी। काफिले में चलने वाले इन लोगों को जमीन खा जाती है या आसमां निगल जाता है, इस अबूझ पहेली का जवाब किसी के पास नहीं था।

 

 

1809 में अंग्रेज सरकार ने ग़ायब होते लोगों की जांच करने के लिए ‘ठगी ऐंड डकैती विभाग’ बनाया, जिसकी ज़िम्मेदारी कैप्टन स्लीमैन को दी गयी। कैप्टन स्लीमैन को काफ़ी तफ्तीश और मेहनत के बाद पता चला कि लोगों के गायब होने के पीछे बहुत ही क्रूर, बेरहम, शातिर और बहुरुपिया ‘बेरहाम ठग’ का हाथ है। बेरहाम ठग के इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे। ठगों का यह काफिला घोड़ों पर सवार होकर हर उस शख्स को अपना शिकार बनाता था जिसके पास धन-दौलत होती थी।

10 साल तक स्लीमैन एक जंगल से दूसरे जंगल तक भटकते रहे पर कामयाबी कोसों दूर थी

 



 

स्लीमैन ने दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक के हाईवे के किनारे जंगल का सफाया कर दिया। फिर भी उन्हें कामयाबी हाथ नहीं लगी। ठगों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए स्लीमैन एक जगह से दूसरी जगह खाक छानते रहे, लेकिन जानकारी के नाम पर उन्हे सिर्फ़ इतना पता था कि ठगों के सरदार का नाम बेहराम है, जिसके गिरोह में 200 से ज़्यादा सदस्य हैं। वह ठगी के लिए एक विशेष सांकेतिक भाषा का प्रयोग करते हैं, जिन्हें ठग ‘रामोसी’ कहते थे। गुप्तचरों की मदद से स्लीमैन ने ठगों की भाषा को भी समझने की कोशिश की। कुछ हद तक स्लीमैन इसमें सफल भी हुए।

‘रामोसी’ भाषा का इस्तेमाल करते थे ठग

10 साल के मशक्कत के बाद स्लीमैन गुप्तचरों की मदद से रामोसी भाषा समझने में सफल हुए थे, जिसे ठग अपने शिकार को खत्म करते वक्त इस्तेमाल करते थे। जैसे पक्के ठग को कहते थे बोरा या औला, ठगों के गिरोह के सरगना को कहते थे जमादार, अशर्फी को कहते थे गान या खार, जिस जगह सारे ठग इकठ्ठा होते थे उसे कहते थे बाग या फूर, शिकार के आस-पास मंडराने वाले को कहते थे सोथा। जो ठग सोथा की मदद करता था उसे कहते थे दक्ष, पुलिस को वो बुलाते थे डानकी के नाम से, जो ठग शिकार को फांसी लगता था उसे फांसीगीर के नाम से जाना जाता था। जिस जगह शिकार को दफनाया जाता था उसे तपोनी कहते थे।

 

10 साल बाद आया हाथ

कैप्टन स्लीमैन करीब 10 साल बाद बेहराम ठग को गिरफ्तार कर पाए। उसने बताया कि उसके गिरोह के सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते रहते थे। व्यापारियों के भेष में इन ठगों का पीछा बाकी गिरोह करता रहता था। रात के अंधेरे में जंगल के पास काफिले को शिकार बना लिया जाता था। धर्मशाला और बाबड़ी आदि के पास भी गिरोह सक्रिय रहता था।

ऐसे करते थे शिकार

 

 

बेहराम ठग ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि उसके गिरोह ने पीले रुमाल से पूरे 931 लोगों को मौत के घाट उतारा है। उसने ये भी खुलासा किया कि अकेले उसने ही 150 लोगों के गले में रुमाल डालकर हत्या की है। गिरफ्तार होने के बाद उसने बताया था कि काफिले के लोग जब सो जाते थे, तब ठग गीदड़ के रोने की आवाज में हमले का संकेत देते थे। इसके बाद गिरोह के साथ बेहराम ठग वहां पहुंचा जाता था। अपने पीले रुमाल में सिक्का बांधकर काफिले के लोगों का गला घोंटता जाता था। लोगों की लाश को कुओं आदि में दफन कर दिया जाता था।

कहा जाता है कि बेहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। बेहराम सहित जितने भी इस गिरोह के कुख्यात सदस्य थे उन्हे जबलपुर के पेड़ों पर फांसी दे दी गई।


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