ट्रेन की चपेट में आकर क्यों मर रहे हैं बाघ ? दो महीने में तीसरी घटना

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Updated on 4 Apr, 2017 at 7:49 pm

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देश में बाघों की संख्या तेजी से घट रही है। पर्यावरणविद जहां इस बात की चिन्ता जताते रहे हैं, वहीं प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता रहा है। अब जो खबर आ रही है वह आपको चौंका सकती है। अब तक हम शिकारियों के निशाने पर होने की वजह से बाघों के लिए चिन्ता जता रहे थे, लेकिन अब रेल ट्रैक्स उनके दुश्मन बनते जा रहे हैं। पिछले दो महीने में 3 बाघ ट्रेन की चपेट में आकर मारे गए हैं।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद बुदनी और मिडघाट क्षेत्र में पिछले शुक्रवार को एक ट्रेन ट्रैक पर बाघ का शव मिलने से सनसनी फैल गई।

दुनिया में बाघों की कुल आबादी का 70 फीसदी भारत में है, जबकि मध्य प्रदेश में बाघ बड़ी तादाद में हैं। ऐसे में यहां आए दिन बाघों की मौत होना वन विभाग के साथ रेलवे विभाग पर कई सवालिया निशान खड़ा करता है।

अभयारण्यों में सुरक्षित नहीं हैं बाघ

मिडघाट रेल सेक्शन पर पिछले दो महीने में तीन बाघ अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि एक तेंदुआ की भी मौत हुई है। इसी साल मार्च महीने में गुजरात के अमरेली में ट्रेन से कुचलकर एक बाघ के मारे जाने की खबर आई थी। पिछले साल दिसंबर महीने में मध्य प्रदेश के ही सतना में एक बाघ के ट्रेन के चपेट में आने से मौत हो गई थी।


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नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनटीसीए) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में अलग-अलग घटनाओं में 78 बाघ मारे गए हैं। यह आंकड़ा पिछले 15 साल में सबसे अधिक है।

मध्यप्रदेश वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012 से वर्ष 2016 तक प्रदेश में 11 शावकों सहित कुल 89 बाघों की मौत हुई है।

दुनिया में बाघों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम हो रही है। अब दुनिया को भारत से उम्मीद है, क्योंकि सबसे अधिक बाघ यहीं बचे हैं।


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