इस अनोखे शिव मंदिर में 16 सालों से नागदेवता कर रहे हैं पहली पूजा

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Updated on 21 Apr, 2016 at 10:52 am

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पश्चिमी मीडिया द्वारा कभी सांप-सपेरों, कभी मंदिरों तो कभी गरीब भारत की बदहाली को आधार बनाकर लगातार ‘भारत’ को अपमानित किया जाता रहा है।

भारत को सांप-सपेरों का देश साबित करने की होड़ में वे यह समझने की गलती करते हैं कि यह भारतीय समाज के पिछड़ेपन और अंधविश्वास का नहीं बल्कि इंसानों और प्राणियों के बीच के संबंधों की अतिविकसित सनातन परम्पराएं हैं।

नाग देवता भारतीय संस्कृति और साहित्य का एक अभिन्न हिस्सा हैं।

सर्प करोड़ो भारतीयों के आराध्य शिव के कंठ की शोभा माने जाते हैं। आज हम आपको भगवान शिव और सर्पों के अद्भुत संबंधों से जुड़े एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां पिछले 16 वर्षों से पूजा एक ‘नाग’ के द्वारा की जा रही है।


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आगरा जिले में स्थित है यह शिव मंदिर

नाग की आस्था की चमत्कारिक घटना उत्तरप्रदेश के आगरा जिले के सैय्या थाना क्षेत्र अंतर्गत सलेमाबाद गांव के शिव मंदिर की है। पिछले सोलह सालों से एक नाग नियमित रूप से भगवान शिव के दर्शन के निमित्त मंदिर में आ रहा है।

स्थानीय लोग और मंदिर के पुजारी के अनुसार यह नाग पूरे पांच घंटे शिवलिंग के समीप बैठा रहता है। हालांकि, इस दौरान मंदिर में आए दर्शनार्थियों के लिए गर्भगृह में प्रवेश रोक दिया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में पुजारी के पूजा करने के बाद सुबह लगभग 10 बजे नाग मंदिर में आता है और दोपहर तीन बजे तक शिवजी की पूजा करता है।

इस दौरान मंदिर में कोई नहीं जाता और न ही नाग लोगों के चढ़ाए दूध को ग्रहण करता है।



लोग मान रहे हैं अवतार

इस प्राचीन शिवालय में दूर-दूर से श्रद्धालु शिवजी की पूजा करने आते हैं, लेकिन नाग की प्रतिबद्धता ने मंदिर की कीर्ति कई गुना बढ़ा दी है। आसपास के क्षेत्रों में भी इस नाग की काफी चर्चाएं हैं।

हालांकि, इससे श्रद्धालुओं को कोई भय नहीं है, क्योंकि इसने अभी तक कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। किसी नाग का रोज मंदिर में आकर शिवलिंग के पास रुकने को यहां के लोग आश्चर्य से नहीं, बल्कि श्रद्धा से देख रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है भगवान शिव के गले में सुशोभित नागदेवता कोई और नहीं, यही हैं। कुछ लोगों का यह भी विश्वास है कि यह नाग किसी देवता का अवतार है।

भारतीय पौराणिक आख्यानों के संदर्भों में अनेक जगह सर्प योनि का जिक्र किया गया है। इसके अलावा सर्पों, देवताओं, यक्षों और गंधर्वों के अंतर्संबधों के विवरण पुराणों में प्रमुखता से मिल जाते हैं। ऋषियों के शाप से कईयों ने सर्प एवं अन्य योनियों में मनवंतरों की तपस्या करके अपने मूल रूप में आकर मोक्ष को प्राप्त किया।

सनातन की पुनर्जन्म अवधारणा, जो वर्तमान में अतीत के कर्मों के अतिक्रमण स्वीकार करती है, के अनुसार ऐसा बिल्कुल संभव है कि यह नाग भी किसी देवता का प्रतिरूप हो, जो किसी शाप या अन्य कारणों से सर्पयोनि में शिव-आराधना कर रहा हो।

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