मिलिए इस मां से जो बनी कई अनाथ बच्चों का सहारा

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5:21 pm 21 Apr, 2016

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इंसान के जीवन में कई कठिनाइयां आती है, उन कठिनाइयों से हार न मानते हुए हम आगे कैसे बढ़ते है, उन कठिनाईयों का सामना कैसे करते है, वही सोच हमारे आगे का रास्ता तय करती है। यहां हम बात कर रहे हैं, सिंधुताई सपकाल की, जिन्होंने अपने निजी जीवन में कई मुश्किलों का सामना किया। उन मुश्किलों से हार न मानते हुए, बल्कि उनसे प्रेरणा लेते हुए सिंधुताई ने जो किया वह एक मिसाल है।

सिंधुताई कई समाजसेवी संस्थाएं चलाती है, जहां न केवल बेसहारा बच्चों को पनाह दी जाती है, बल्कि उनकी शिक्षा और रख-रखाव का पूरा ख्याल रखा जाता है। आज उनकी संस्थाओं के बच्चे कई ऊंचे पदों पर काम कर रहे हैं।

बेहद ही गरीब परिवार में जन्मीं सिंधुताई का जन्म एक गोपालक परिवार में 14 नवंबर, 1948 को हुआ। उनके परिवार की रुढिवादी सोच के कारण उन्हें चौथी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। जिस उम्र में बच्चे अठखेलियां करते हैं, उसी उम्र में उनकी शादी करा दी गई। शादी के वक्त उनकी उम्र महज 9 साल थी।

सिंधुताई आगे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं, लेकिन उनके ससुरालवाले इसके सख्त खिलाफ थे। यहां तक कि जब वह गर्भवती थीं, तब उन्हें कई यातनाएं झेलनी पड़ी। उनके पति उन्हें पीटा करते थे और एक दिन गर्भवती अवस्था में उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया।

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महीनों तक सिंधुताई सड़कों पर दर-दर की ठोकरे खाती रही और एक तबेले में बेटी को जन्म दिया। यहां तक कि उनके अपने मां-बाप ने उन्हें पनाह नहीं दी। बेटी होने के बाद कई सालों तक उन्होंने ट्रेन में भीख मांगकर अपनी बच्ची का पालन पोषण किया।

ऐसे ही एक दिन एक बच्चा रेलवे स्टेशन पर उन्हें भूख से तड़पता हुआ मिला। तब उन्होंने सोचा कि ऐसे ही न जाने कितने बेसहारा बच्चे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। यहीं से शुरुआत  हुई एक ऐसे सफर की, जिसके बाद सिंधुताई ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आज उनके द्वारा किया गया एक प्रयास महाराष्ट्र की 6 बड़ी समाजसेवी संस्थाओं में तब्दील हो चुका है।

इन संस्थानों में रहने वाले बच्चों के पालन-पोषण व शिक्षा-चिकित्सा का भार सिंधुताई के कंधों पर है। जिसमें हज़ारों की संख्या में बच्चे एक परिवार की तरह रहते है। इन बच्चों ने सिंधुताई को मां का दर्जा दिया है।

सिंधुताई की इन संस्थानों में ‘अनाथ’ शब्द के कहने पर पूरी तरह से मनाही है।

ये संस्थाएं न केवल बच्चों को, बल्कि विधवा महिलाओं को भी आसरा देती है। ये महिलाएं बच्चों के लिए खाना बनाने से लेकर उनकी देखरेख का काम करती है।

जो बच्चा उन्हें रेलवे स्टेशन पर मिला था, वह आज उनका सबसे बड़ा बेटा है। वह सिंधुताई के संस्थानों का प्रबंधन संभालता है।

सिंधुताई अब तक 272 बेटियों की शादी करवा चुकी हैं। वहीं उनके इस ख़ास परिवार में 36 बहुएं भी हैं। इन संस्थानों में सब मिलजुल कर रहते हैं।

सिंधुताई के इस नेक कार्य को सराहते हुए उन्हें राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करीबन 500 अवार्ड्स से सम्मानित किया गया है।

सिंधुताई इन बच्चों के लालन-पालन के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने से नहीं चूकती। उनका मानना है कि अगर मांगकर इन बच्चों का लालन-पोषण हो सकता है, इन्हें एक बेहतरीन ज़िन्दगी मिल सकती है तो मांगने में कोई हर्ज नहीं।

उनके कार्यों को लेकर, उनके जीवन के कठिन परिश्रम पर ‘मी सिंधुताई सपकाल’ फिल्म और ‘मी वनवासी’ धारावाहिक भी बन चुका है।

सिंधुताई को बीते साल राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा ‘आइकॉनिक मदर’ का नेशनल अवार्ड मिला था।


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