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संथाल विद्रोह के नायक सिद्धो-कान्हू को समर्पित है ‘अग्निपथ’

Published on 29 March, 2018 at 1:25 pm By

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध में न केवल भारतीय इतिहासकारों ने लिखा है, बल्कि विदेशी खासकर ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी इसे तवज्जो दी है। आमतौर पर कहा जाता है कि भारत में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल 1857 में फूंका गया था। बैरकपुर में मंगल पांडे द्वारा हथियार उठाने की घटना को इतिहासकारों ने प्रथम सैन्य विद्रोह के रूप में मान्यता भी दे रखी है। हालांकि, कई इतिहासकारों का यह भी मत है कि अंग्रेजों के खिलाफ 1857 से पहले भी विद्रोह की घटनाएं हो चुकी थीं। खास बात यह है कि इन विद्रोहों में आदिवासियों की बड़ी भूमिका रही थी। यह अलग बात है कि विद्रोह की इन घटनाओं को बड़े पैमाने पर इतिहासकारों ने नजरअंदाज किया था। कुल मिलाकर ये दोनों चीजें बहस का विषय हैं।


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वर्ष 1855 में मुर्शिदाबाद तथा भागलपुर जिलों में अंग्रेज कर्मचारियों व सरकार के अत्याचार से तंग आकर संथाल जनता ने एकबद्ध होकर सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संथाली भाषा में ‘हूल’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है-‘विद्रोह’। इस जनआंदोलन का नेतृत्व सिधु-कान्हू नामक दो संथाल भाइयों ने किया था।

संथाल विद्रोह पर आधारित पुस्तक ‘अग्निपथ’ इस जनआंदोलन के नायक सिद्धो-कान्हू को समर्पित है।

 



 

शिक्षाविद् व लेखक डॉ. दिनेश मिश्र द्वारा लिखित इस पुस्तक का लोकार्पण धनबाद के स्थानीय पीके राय कॉलेज में किया गया। इस अवसर पर कई वरिष्ठ शिक्षाविद्, छात्र व समाज के अन्यान्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

डॉ. दिनेश मिश्र कहते हैंः


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“संथाल विद्रोह या संथाल हुल न केवल भारत का, बल्कि एशिया का सबसे बड़ा जनांदोलन रहा है। इतिहासकारों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी नायकों की भूमिकाओं को उचित स्थान नहीं दिया है। इस पुस्तक में मैनें काल्पनिक चरित्रों के जरिए एक बार फिर से उस दौर के महान आंदोलन को याद करने की कोशिश की है।”


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डॉ. मिश्र का मत है कि 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था।

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