सियाचिन में तैनात भारतीय जवान किसी महानायक से कम नहीं होते

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Updated on 23 Dec, 2016 at 5:26 pm

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सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हिमनद है। सामरिक रूप से यह भारत और पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है। सियाचिन में तैनात जवानों की क्षमता किसी महानायक से कम नहीं होती। आइए जानते हैं किस तरह की विषम परिस्थितियों में भी हमारे यह जवान माइनस 50 डिग्री में भी फौलाद की तरह खड़े रहते हैं।

नहाना है मना

इन जवानों को नहाने के लिए मनाही है क्योकि अगर इन्होने पानी शरीर पर डाला तो जम जाएगा।

निरंतर व्यायाम है जीवन

माइनस 50 डिग्री में इन जवानों को निरंतर अभ्यास और व्यायाम करने की जरूरत होती है, वरना शरीर के अंग जम जाते हैं। यही वजह है कि यहां सैनिक निरंतर अभ्यास करते रहते हैं।

सोते हैं बर्फ के बंकर में

हमारे जवानों की ज़िंदगी बिल्कुल भी आसान नहीं होती। मात्र दो घंटे मिलते हैं, सोने के लिए। रात दो बजे सो कर चार बजे तक उठ जाते हैं। इस तरह सीमा की निगरानी करना सबके बस की बात नहीं।

विषम परिस्थितियों से लेते हैं लोहा


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सियाचिन में तैनात जवानों को विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अंधे गड्ढे किसी कब्र से कम नहीं होते। इसके इलावा मति भ्रम का ख़तरा होता है। भीषण बर्फ़ीले तूफ़ानों की वजह से हमेशा मति भ्रम होता है कि दुश्मन आ रहे हैं। और तो और एक पोस्ट पर सिर्फ़ दो जवान ही रह सकते हैं, क्योंकि जो सोने की जगह होती है, वह रेल गाड़ी के सीट के बराबर होती है।

अभ्यास ही जीवन है

यहां हालात इतने खराब होते हैं कि शौचालय के लिए भी अभ्यास करना होता है। सीजीआइ सीट से शौचालय का जुगाड़ होता है। अगर आप अख़बार पढ़ने के शौकीन है तो भूल जाइए। अख़बार तो दूर अगर अपने ज़्यादा वक़्त लगाया तो ‘फ्रॉस्टबाइट’ होने का ख़तरा है।

दस्ताने उतार कर अगर किसी धातु को छुआ तो ‘मेटॅलबाइट’ होंने की वजह से त्वचा उतरने लगेगी। शरीर को गर्म रखने के लिए कोई हीटर नही होते इसलिए मिट्टी के स्टोव का उपयोग करना होता है। अगर मिट्टी का तेल शरीर पर लग जाए तो आयल बर्न होने की आशंका होती है। इसलिए बिना अभ्यास के यहां जीना मुश्किल है।

हैं न यह जवान सच में महानायक? एक सलाम तो बनता ही है भारत के इन वीर सपूतों के लिए। 

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