ऐतिहासिक फिल्म शोले के इस अभिनेता की हुई ऐसी दर्दनाक मौत

Updated on 27 Oct, 2017 at 7:07 pm

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मुंबई वाकई एक सपनों का शहर है, मायानगरी है। यहां अपनी आंखों में सपने संजोये बॉलीवुड में किस्मत आजमाने न जाने कितने लोग आते हैं। उनमें से कुछ ही सफल हो पाते हैं।

ऐसे ही एक सफल और महान कलाकार रहे हैं एके हंगल। बतौर कलाकार सदियों तक ज़िंदा रहने वाले हंगल साहब की मौत हालांकि एक दर्दनाक कहानी बन गई है।

13 अगस्त 2012 को हंगल साहब बाथरूम में फिसल गए थे। उनकी पीठ में चोट लगने और कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उनकी सर्जरी हुई, लेकिन सेहत में सुधार नहीं हो सका। उन्हें सीने में दर्द और सास लेने में तकलीफ़ होने के कारण वेंटीलेटर पर रखा गया और अंततः 26 अगस्त को सुबह नौ बजे के क़रीब मुंबई के आशा पारेख अस्पताल में 95 साल के इस महान एक्टर का निधन हो गया था।

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एके हंगल बॉलीवुड के बड़े चेहरों में शुमार किए जाते हैं, लेकिन उन्‍हें अपने जीवन के अंतिम दिन मुफलिसी में बिताने पड़े। वर्ष 1914 में जन्‍में एके हंगल नाना, पिता, नेता, स्कूल मास्टर, रिटायर्ड जज, डॉक्टर, प्रोफेसर, पंडित, संत, कर्नल जैसे तमाम किरदारों में नजर आए। आख़िरी दिनों में वे सैंटा क्रूज के एक छोटे से फ्लैट में अपने बेटे के साथ रहा करते थे।

नहीं आती थी हिन्दी!

“जानकर हैरानी होगी कि 50 साल की उम्र में फिल्मों में आकर वे एकदम से छा गए थे। उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ उन्होंने 16 फिल्मों में काम किया था। उन्हें हिन्दी पढ़ने में दिक्कत होती थी, लिहाजा उन्हें उर्दू में स्क्रिप्ट लिखकर दिए जाते थे। फिल्मों के साथ-साथ वह थियेटर में भी सक्रिय रहे थे।”



हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं दूरदर्शन कलाकार हंगल साहब का पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। उनका जन्म 1 फ़रवरी 1917 को कश्मीरी पंडित परिवार में अविभाजित भारत में पंजाब राज्य के सियालकोट में हुआ था। वर्ष 1967 से हिन्दी फ़िल्म उद्योग का हिस्सा रहे हंगल ने लगभग 225 फ़िल्मों में काम किया। उन्हें फ़िल्म ‘परिचय’ और ‘शोले’ में अपनी यादगार भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।

अंग्रेजों से लिया था लोहा

आपको बता दें कि हंगल साहब भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी अपनी भागीदारी निभा चुके हैं। 1930-47 के बीच स्वतंत्रता संग्राम में वे सक्रिय रहे और दो बार जेल जाना पड़ा। भारत सरकार ने वर्ष 2006 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था।

बावजूद उन्हें जीवन के अंतिम समय में दुःख ही नसीब हो सका। जीवन के आर्थिक तंगी के दौर में समाज से लेकर सरकार तक किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया।


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