पारे से निर्मित शिवलिंग है भगवान शंकर का स्वरूप, अकाल मृत्यु से करता है रक्षा

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Updated on 10 Apr, 2017 at 8:17 am

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वैदिक धर्मग्रंथों में पारद को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। इसे ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य के प्रतीक के रूप में स्वीकृत किया गया है। पौराणिक ग्रंथों और ज्योतिष में पारद शिवलिंग के माहात्म्य को बड़ी गहनता से वर्णित किया गया है।

पारद (पारा) को रसायनशास्त्र में रसराज कहा जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार पारद से बने शिवलिंग की पूजा करने से बिगड़े काम बनते हैं। यहां तक कि अकाल मृत्यु भी टल जाती है। इनके नित्य पूजन, अभिषेक और दर्शन मात्र से सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। परन्तु यदि पारद शिवलिंग का आकार या विन्यास उचित या शास्त्रसम्मत न हो, तो यह नुकसान भी कर सकता है।

आज हम आपको भगवान शिव के स्वरूप पारद शिवलिंग की उन बारीकियों और प्रयोगों के बारे में बताएंगे, जिनके बारे में जानकर आप भी इसका सही लाभ लेकर अपने जीवन को सभी तरह की भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों से युत रख सकते हैं।

पारद शिवलिंग का धार्मिक महत्व

पुराणों और प्राचीन भारतीय संहिताओं में पारद शिवलिंग की बहुत प्रशंसा की गई है। शिवपुराण के अनुसार गौ का हत्यारा, कृतघ्न, गर्भस्थ शिशु का हत्यारा, शरणागत का हत्यारा, मित्रघाती, विश्वासघाती, दुष्ट, महापापी अथवा माता-पिता को मारने वाला भी यदि पारद शिवलिंग की पूजन करता है, तो वह भी तुरंत सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

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वहीं शिवनिर्णय रत्नाकर के टीकाकार के अनुसार मिट्टी या पत्थर से करोड़ गुना अधिक फल स्वर्ण निर्मित शिवलिंग के पूजन से मिलता है। स्वर्ण से करोड़ गुना अधिक मणि और मणि से करोड़ गुना अधिक फल बाणलिंग नर्मदेश्वर के पूजन से मिलता है।

नर्मदेश्वर बाणलिंग से भी करोड़ो गुना अधिक फल पारद निर्मित शिवलिंग से प्राप्त होता है। इससे श्रेष्ठ शिवलिंग संसार में नहीं हुआ है।

वाग्भट्ट के अनुसार, जो व्यक्ति पारद शिवलिंग का भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह तीनों लोकों में स्थित शिवलिंगों के पूजन का पुण्य प्राप्त करते हुए समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त हो जाता है। पौराणिक दस्तावेजों के अनुसार समय-समय पर कई पौराणिक पात्रों ने पारद शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा और पूजन करके महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की थीं।

लंकापति रावण ने पांच सहस्र प्रस्थ (1 प्रस्थ अर्थात 5 किलो) वजन का तूतफेन पारद शिवलिंग विश्वकर्मा से बनवाया था। यही कारण है कि लंका तीनों लोकों में सबसे अधिक शक्तिशाली और अभेद्य दुर्ग बन गया था।

इसी तरह देवराज इंद्र द्वारा भी दानवों से स्वर्ग और धरती की रक्षा के लिए वज्रदंती नामक पारद शिवलिंग की स्थापना प्रभास क्षेत्र में की गई थी। इस वजह से वे बिना युद्ध के लिए दानवों को परास्त करने में सफल हुए थे।

पारद शिवलिंग की आदर्श वैज्ञानिक निर्माण विधि

पारद शिवलिंग अति चमत्कारी धातु पारे से बनाया जाता है। मूलतया यह धातु तरल अवस्था में होती है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न धातुओं जैसे सोना, चांदी और ताम्बा सहित अन्य विभिन्न रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण और ताम्र के साथ मिलाया जाता है और फिर एक आकार दिया जाता है।



एक आदर्श पारद शिवलिंग में कम से कम 70% पारा, 15% मैग्नीशियम तथा 10% कार्बन तथा 5% पोटैसियम कार्बोनेट(अंगमेवा) होना चाहिए। यदि पारद शिवलिंग इन रासायनिक मापदंडों पर खरा उतरता है, तभी वह शुद्ध और परिणाम देने वाला होता है।

बगैर जांचे-परखे न खरीदें पारद शिवलिंग

आज के व्यापार प्रधान युग में बाजार में बने बनाए पारद शिवलिंग मिलते हैं। ज्यादातर मामलों में ये सर्वथा अशुद्ध एवं किन्हीं विशेष परिस्थितियों में हानि कारक भी होते है। जैसे बोरेक्स और जिंक के संयोग से बना शिवलिंग भी पारद शिवलिंग जैसा ही दिखाई देता है। इसी भाँति एल्युमिनियम से बना शिवलिंग भी पारद शिवलिंग जैसा ही लगता है।

आकस्मिक विपदाओं से पूर्व हो जाता है खंडित

पारद शिवलिंग अति प्रभावशाली और चमत्कारी परिणामों को देने वाला होता है। य़दि बहुत प्रचण्ड तांत्रिक प्रयोग या अकाल मृत्यु या वाहन दुर्घटना योग हो तो शुद्ध पारद शिवलिंग उसे अपने ऊपर ले लेता है। और कुछ समय पूर्व ही वह अपने आप टूट जाता है और साधक की रक्षा करता है। पारद शिवलिंग जहाँ स्थापित होता है उसके 100 फ़ीट के दायरे में उसका प्रभाव होता है।

ऐसे करें स्थापना

शास्त्रों में पारद शिवलिंग एवं इसके साथ रखे जाने वाले दक्षिणा-मूर्ति शंख की बहुत ही उच्च महत्ता बताई गई है। आप भी इसे अपने घर में स्थापित कर घर में समस्त दोषों से मुक्त हो सकते हैं। लेकिन यह ध्यान अवश्य रखें कि साथ में शिव परिवार का पूजन करना अनिवार्य है।

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