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जानिए क्यों चिकन पॉक्स को भारत में कहा जाता है ‘माता’

Published on 6 December, 2017 at 5:28 pm By

हमारे देश में चिकन पॉक्स को आमतौर पर ‘माता’ ही कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि सबको अपने जीवनकाल में कभी न कभी एक बार चिकन पॉक्स होता ही है और टीके के ईजाद से विलुप्त होती ये बिमारी से कई मिथक जुड़े हुए हैं।


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जानकारी के मुताबिक , चिकन पॉक्स खसरा से फैलने वाली एक बीमारी है, जो सीधे ‘हाइजीन’ से जुड़ी हुई है। हम सभी ने शीतला माता के बारे में तो सुना ही होगा। चिकन पॉक्स को खासकर शीतला माता से जोड़ा जाता है। शीतला माता को दुर्गा माँ का स्वरुप मानकर पूजा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उनकी पूजा करने से चेचक, फोड़ा-फुंसी, घाव आदि बीमारियां दूर होती है।

 

किंवदंती के अनुसार, जब भी कोई खसरा जैसे रोग से ग्रस्त होने वाला होता है तो माताजी उसके शरीर में आकर खसरे को खत्म करती है, ताकि व्यक्ति फिर स्वस्थ हो पाए।

 


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ऐसा भी प्रचलित है कि चिकन पॉक्स दिव्य क्रोध, सजा, प्रतिशोध आदि के परिणामस्वरूप आते हैं। भारत में इसे माता की ओर से सजा माना जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं इस समय मरीज को किसी तरह की दवाइयां देना वर्जित माना जाता है और सिर्फ नीम की डालियां ही एकमात्र उपाय समझा जाता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, शीतला माताजी पोक्स देवी हैं, जो भारतीय उप महाद्वीप में पूजी जाती हैं। शीतला माताजी ठंडे चीजें और शीतलता को पसंद करती हैं, लिहाजा उनका नाम शीतल है अर्थात् शांत है। यही कारण है कि जब कोई पॉक्स या खसरा से पीड़ित होता है तो उसे ठंडे या बासी भोजन का सेवन कराया जाता है।

 

 



शीतला माताजी का उग्र व्यक्तित्व माना जाता है। वह शीतलता पसंद करती हैं या उन्हें शांत करने के लिए शीतल वस्तुओं का भोग दिया जाता है। शास्त्रों में शीतला माता को दुर्गा का ही एक प्रादुर्भाव माना गया है।

 

वह लाल साड़ी और नीम के पत्तों से बनी माला धारण कर एक गधे पर सवारी करती हैं। माता के एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में पवित्र जल का पात्र होता है। इसी झाड़ू से माता रोग देती है और उचित पूजा और सफाई रखने पर पवित्र जल से बीमारी को हर लेती हैं। चिकन पॉक्स जब ठीक हो जाते हैं तो लोग माताजी के दर्शन करने मंदिर जाते हैं और पूजा करते हैं।

 

चिकन पॉक्स होने पर रोगी को साफ़-सुथरा रखा जाता है और उसे ठंडी चीजें खाने को दी जाती हैं। इसके रोगी अपने पास नीम के पत्ते पास रखते हैं, जिससे जीवाणुओं का नाश होता है। प्राकृतिक उपायों से रोगी को ठीक करने के प्रयास किए जाते हैं।

 

शीतला माता के बारे में ये कहानी प्रचलित हैं कि वे 7 बहनें थी, जिनका निवास नीम के पेड़ पर हुआ करता था। नीम को बैक्टीरियल इन्फेक्शन दूर करने का भी कारक माना जाता है। तो जब भी कोई ‘चिकन पॉक्स’ या ‘माताजी’ की इस बीमारी का शिकार होता है, उसे नीम की पत्तियों पर सोने की सलाह दी जाती है।

 

अगर कोई शीतला माताजी के चरित्र का व्याख्यान करें तो पता चलेगा कि प्राचीन भारतीय चिकित्सक कितने जानकार थे। भारत में मिथकों और परंपराओं को स्वच्छता और चिकित्सा विज्ञान के साथ बुना गया है, ताकि लोग उनका पालन करें।

माताजी के हाथ में चांदी का झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक है, पानी ठंढापन का प्रतिनिधित्व करता है, नीम माला इसकी औषधीय गुणों के लिए है तो गधा हठ और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।


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मिथक या पारंपरिक मान्यताओं के पीछे भी मजबूत वैज्ञानिक आधार छुपा रहता है, जिसकी सही व्याख्या और जानकारी जरूरी है!

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