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कैंसर की वजह से खो दिया अपनी बेटी को; बन गईं सैकड़ों ग़रीब मरीज़ों का सहारा

Published on 20 February, 2016 at 10:54 pm By

केरल के त्रिस्सुर में रहने वाली शीबा अमीर अपनों को खोने का दर्द भली भांति जानती हैं। शीबा ने अपनी 13 वर्षीय बेटी को कैंसर के आगे ज़िन्दगी को हारते देखा है।

शीबा अमीर सालों तक अस्पतालों में डॉक्टरों से मदद की गुहार लगाती रहीं। यही नहीं, उन्होंने भगवान-खुदा के सामने घंटों दुआ की, ताकि उनकी जान से बेटी प्यारी बेटी को कैंसर से बचाया जा सके। फिर जिन्दगी के पल थम से गए।


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“इस एहसास में जीना की अगले दिन मेरी बेटी जिंदा होगी भी या नहीं, बहुत मुश्किल और दुःख भरा था।  हम लोग खुशकिस्मत थे कि हमारे पास पर्याप्त पैसे थे और उसका इलाज़ टाटा मेमोरियल जैसे बड़े अस्पताल में करा सकते थे। पर हर किसी के पास महंगे इलाज़ के लिए पैसे नहीं होते।”

शीबा आंखें नम कर जब ये कहती हैं तो पत्थर दिल भी पिघल जाता है।

कैसे वह नन्हीं सी परी कैंसर जैसी बीमारी से लडती रही, वह तो भगवान ही जानता होगा। न जाने कितने ही कीमो सेशन और एक बोन ट्रांसप्लांट के बाद कुछ उम्मीद तो दिखी, पर एक इन्फेक्शन के बाद वह बच्ची कैंसर से हार गई।

“वह बहुत बहादुर थी। वह एक फाइटर थी। इतनी मुश्किलें सहने के बाद भी वह नहीं बच सकी। एक बात जो मुझे बहुत तकलीफ़ देती है, जिसे मैं चाह कर भी कभी नही भूल पाती हूं। ऐसी स्थिति मे अपने बच्चों के लिए खुद को बेबस पाने से ज़्यादा बुरा कुछ नहीं हो सकता।”

शीबा ने उस दिन से यह प्रण किया कि वह किसी को अपनी तरह कभी बेबस नहीं होने देंगी। फिर इस गृहिणी ने जो भी कुछ किया वह निश्चित ही प्रेरणादायक है।

जब शीबा और उनकी बेटी कैंसर की जंग लड़ रहे थे, उसी दौरान 2007 में उन्होंने “सोलेस” नाम की एक संस्था बनाई। जिसका अर्थ है ‘सांत्वना’। इस संस्था का उद्देश्य है कि उन कैंसर पीड़ितों और उनके परिवारों को सस्ती मेडिकल सुविधा और मानसिक और सामाजिक मदद मुहैया कराया जाए, जो सक्षम नही हैं।

“क्योंकि मैं जानती हूं कि एक मां के लिए अपने बच्चे को खोने का दर्द क्या होता है। मैं नहीं चाहती कोई और मां इस दर्द से गुज़रे। सोलेस की शुरुआत यहीं से होती है। एक साधारण मुस्लिम गृहणी होने के कारण मुझे कभी अपने घर से बाहर निकलने का मौका नहीं मिला, पर मेरे संघर्ष ने मुझे ताकत दी।



सोलेस के अब तक तीन सेंटर स्थापित हो चुके हैं। इस संस्था में लगभग 30 से 40 लोगों की टीम है, जो कैंसर पीड़ितों की हर छोटी से छोटी जरूरत का ख्याल रखती है। परिवार के सदस्यों को काउंसलिंग देने से लेकर उन्हें आर्थिक मदद देने तक सोलेस कैंसर पीड़ितों एक सहारे से कम नही हैं।


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शीबा हर महीने करीब 8 लाख रुपए संस्था को उपलब्ध कराती है। इस संस्था की वजह से अभी तक 900 से भी अधिक लोगों को सहायता मिल चुकी है। सोलेस के हौसला बढ़ने के लिए दुनिया भर के डॉक्टर और लोग खुलकर सहयोग कर रहे हैं। शीबा कहती हैंः

“ बहुत से लोग हमारी मदद करने के लिए आ रहे हैं हम उन सभी दोस्तों के शुक्रगुजार हैं, जिनकी आर्थिक सहायता से हम कुछ जाने बचा पा रहे हैं।”

सोलेस ने सफलतापूर्वक कई कैंसर पीड़ितों की मदद की है। श्रीहरी जो एक स्कूली छात्र है, इस बात का एक उदाहरण है। श्रीहरी का परिवार उसका इलाज़ करने में समर्थ नहीं था। मदद के लिए उसका परिवार सोलेस के पास आया। यह संस्था श्रीहरी और उसके परिवार के साथ पूरे तीन साल तक जुडी रही और श्रीहरी को इस बीमारी से बाहर निकाला, आज श्रीहरी पहले की तरह नियमित तरीके से वापस पढाई कर पा रहा है।

शीबा यहीं नहीं रुकना चाहती। वह कहती हैं कि सोलेस ही अब उनकी बेटी है। जो कुछ भी कर रही हूं, उसके पीछे सिर्फ़ उन परिवार वालों का मुस्कुराता चेहरा है, जिनके अपनों को हम बचा पाते हैं। शीबा चाहती हैं कि कैंसर के क्षेत्र में अपने योगदान को और भी बढ़ाएं। भविष्य में वह पूर्ण व्यवस्थित उपचार-पश्चात केंद्र को शुरू करना चाहती हैं। उनकी कोशिश यह है कि उन परिवार को सहयोग मिल सके, जो कैंसर जैसी भयवाक बीमारी के दौर से गुज़र रहे हैं।


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शीबा का यह नेक कार्य प्रशंसनीय है। आपकी क्या राय है ?

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