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‘दिलवाले’ का बहिष्कारः सही है या ग़लत?

Published on 21 December, 2015 at 1:32 pm By

आज मेट्रो से ऑफिस के लिए आ रहा था। माहौल कुछ बदला-बदला सा था। जो अधेड़ थे, वे अंकल बन कर सीनियर सिटिज़न की सीट पर क़ब्ज़ा किए हुए थे। और जो वाकई अंकल लग रहे थे, शायद घर से च्यवनप्राश का सेवन कर झूलते हुए, उसके फ़ायदे दिखा रहे थे। एक विषय गरमाया हुआ था। पर वो रोज़ की तरह मोहल्ले वाले को कोसना या, अपने बेटे-बेटी को सफल बताने का नहीं था। बात हो रही थी फिल्मों की और विवाद की।

 


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पहले तो मुझे लगा वह शायद पासपोर्ट ऑफिस मे बड़े बाबू होंगे। पर जैसे जैसे बात बढ़ी माज़रा समझ में आ गया। शायद जो हिन्दुस्तानी शॉल, मौसम बदलने पर श्रीमती जी ने बड़े बक्से में बंद कर दिया था। अब ठंड बढ़ने पर उसे वापस निकाल दिया होगा। उनमें से एक जनाब कह रहे थे कि यह फिल्म हम हिंदुस्तानियों को नही देखनी चाहिए। इसकी कमाई का हिस्सा पाकिस्तान जाता है। ये तो भला हो की मेट्रो में कोई रॉ या आइबी के अधिकारी सफ़र नही करते, वरना इतनी अहम खूफिया जानकारी जान कर उन्हें शर्मिन्दा होना पड़ता। भला वो सफ़र भी क्यों करें मेट्रो में। सरकार उन्हें वैसे भी इतनी सुविधाएं दे रही है। उनके पास दाऊद जैसे केस वैसे भी 10-15 साल से पड़े ही हैं।

 

 

अमुक फिल्म का विरोध भारत में जम कर हो रहा है। नारों में पाकिस्तान भेजने की बात से लेकर, हम सच्चे हिन्दुस्तानी हैं, के जुमले शामिल हैं। देश के कई हिन्दुवादी संगठनों द्वारा फिल्म न देखने की अपील की जा रही है। दिल्ली, भोपाल, गोरखपुर समेत देश कई बड़े शहरों में शुक्रवार को रिलीज हुई इस फिल्म का जमकर विरोध हो रहा है। हालांकि अभिनेता ने पहले ही अपने असहिष्णुता बयान को लेकर माफी मांग ली थी। बावजूद इसके उनको लेकर लोगों का रोष बरकरार है।


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पर विरोध क्यों हो रहा है, यह साफ कह पाना मुश्किल होगा। दरअसल, आजकल हमारे देश में ऐसा माहौल बनाया गया है, जिससे लगता है कि यहां पल रहे धर्म कितने संकट में हैं। साथ में यह भी बताया जा रहा है कि अगर यहां जो विरोध कर रहे 2-4 संगठन न होते, तो शायद मेरा नाम आज ‘शिरीष त्रिपाठी’ की जगह ‘शिरीष चार्ल्स’ या ‘अब्दुल शिरीष रहमान’ होता या फिर आपको अपना नाम बदल कर ‘रिज़वान त्रिपाठी’ रखना पड़ता। और तो और इन संगठनों ने धर्म को बचाने का जिम्मा भी पूरी तौर पर अपने कंधे पर ले लिया है।

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एक बात साफ तौर पर कहना चाहता हूँ कि,

 “न तो में नास्तिक हूं और न ही मैं धर्म विरोधी हूं। मेरे पूजा पाठ और उनमें लिप्त कर्म कांड मेरे  अंतरात्मा से हैं। और स्वतंत्र होने के नाते मेरे विचार भी स्वतंत्र हैं, जिसमें मुझे अपनी पसंद और नापसंद चुनने का विचार भी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरा ही है।”

 

अगर यह फिल्म मैं देखने जाता हूं या फिर नही भी जाता हूं, तो मुझे नहीं लगता की  मेरे हिन्दुस्तानी होने पर किसी को शक़ करना चाहिए। और न ही मुझे कोई संगठन आकर ये राय दे की मुझे पाकिस्तान चले जाना चाहिए। दरअसल धर्म की रक्षा करने वाले ये लोग इतना भयभीत कर चुके हैं की किसी दिन आपके घर भी पहुंच सकते हैं। यह बताने के लिए कि आपने ऐसा नहीं किया तो यह समाज आपका बहिष्कार करेगा और ज़रूरत पड़ी तो गैर मज़हबी बोल कर किसी दूसरे देश का वीज़ा भी दिलवा देगा।

“सच तो यह है की हम मशीन बन चुके हैं। कोई धर्म बचाने वाला बोल कर बटन दबाता है और हम उसके हिसाब से काम करना शुरू कर देते हैं। और जब हमारे एक एक पेंच ढीले हो जाते हैं, उनके हिसाब से काम करना बंद कर देते हैं, तो यही लोग उतार कर कहीं किनारे रख देते हैं।”

 

 


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ठीक है आप किसी बात से आहत हुए, उन्होंने क्षमा भी मांगी, पर सिर्फ़ बात से किसी को सच्चा हिन्दुस्तानी या धार्मिक तो नही कह सकते न? मुझे अपने बचपन का एक किस्सा याद आता है। मुझे अक्सर बरसात के वक़्त मेंढकों का टर-टराना अजीब लगता था। मैं अपने पिता जी से पूछा करता था की ये मेंढक कीचड़ भरे बरसात में भी कैसे खुशी-खुशी गा लेते हैं। तब मेरे इस नादानी भरे सवाल पर मेरे पिता जी कहते थे कि कीचड़ को कोई पसंद नही करता, इसलिए सड़कें खाली रहती है, लोग बच के चलते हैं। पर इन मेंढकों को वीरता दिखाने का यही मौका होता है और जब तक ऐसी बरसात होगी तब तक वे टर्राएंगे। शायद इसका मतलब अब समझ गया हूं।

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