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जानिए क्या है गुप्त नवरात्र का महत्व

Published on 30 September, 2016 at 4:59 pm By

सनातन परम्परा में हर दिन किसी न किसी तरह का त्यौहार जरूर होता है। क्या आपको पता है की आजकल नवरात्र चल रहे हैं। जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा आजकल नवरात्र के पावन दिन चल रहे हैं। असल में वासंतिक और शारदीय नवरात्रों से तो आम जनमानस परिचित हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं, जिनके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं है, इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है। ये माघ और आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के शुरुआती नौ दिनों में पड़ती हैं। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं।


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गुप्त नवरात्र का पर्व आम जनों की तुलना में ज्ञान साधना के प्रति अत्यंत सजग शक्ति उपासकों तक ही सीमित रहता है। महर्षि श्रृंगी के अनुसार “जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी भांति गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।”

मन्त्र-साधना के लिए उपयुक्त हैं ये नवरात्र



सतयुग में चैत्र नवरात्र, त्रेता में आषाढ़ नवरात्र, द्वापर में माघ और कलयुग में आश्विन की साधना-उपासना का विशेष महत्व रहता है। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई नास्तिक भी परिहासवश इस समय मंत्र साधना कर ले तो उसे भी फल सफलता के रूप में अवश्य ही मिलता है। यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है। मार्कंडेय पुराण में इन चारों नवरात्रों में शक्ति के साथ-साथ इष्ट की आराधना का भी विशेष महत्व है।

तंत्र-साधकों के लिए है विशेष

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने बहुत प्रयास किए, लेकिन उनके हाथ सिद्धि नहीं लगी। ज्योतिषीय गणनाओं में उन्हें बोध हुआ कि केवल गुप्त नवरात्रों में शक्ति के इन दसों स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है। गुप्त नवरात्रों में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। इन सिद्धियों के कारण उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। एक अन्य कथा में मां शक्ति ने अपने शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी नाम वाली दस महाविद्याओं को प्रकट कर दुर्ग का वध किया। इसी कारण मां शक्ति का नाम ‘दुर्गा’ पड़ गया। इन दस महाविद्याओं की साधना के लिए तभी से ‘गुप्त नवरात्र’ मनाया जाने लगा।

पुराणों में ‘गुप्त नवरात्रों’ की महिमा


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अनेक शाक्त ग्रंथो में गुप्त नवरात्रों के माहात्म्य का विशद वर्णन किया गया है। ‘शिवपुराण’ के अनुसार इन गुप्त नवरात्रों में भगवान शंकर और जगतजननी माता पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं। गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में मां का जप, तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं नष्ट होने लगती हैं। साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में आषाढ़ के गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को हर तरह की सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

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