प्रोफेसर सतीश धवन ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को दिलाई विश्वव्यापी पहचान

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Updated on 3 Jan, 2017 at 3:42 pm

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देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वाले प्रोफेसर सतीश धवन को भारत में प्रयोगात्मक फ्लूइड डायनामिक्स रिसर्च का पितामह माना जाता है।

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25 सितंबर, 1920 को श्रीनगर में जन्मे सतीश धवन ने अपनी उच्च शिक्षा अमेरिका से प्राप्त की। उन्होंने अमेरिका में मिन्‍नेसोटा यूनिवर्सिटी से वैमानिक इंजीनियरिंग में एमएस किया। इसके बाद उन्‍होंने कैलिफोर्निया इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी से एयरोस्‍पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।

भारत के प्रसिद्ध रॉकेट वैज्ञानिकों में शुमार प्रोफेसर सतीश धवन को विक्रम साराभाई के बाद देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने 1972 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्यक्ष का पद संभाला।


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बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC) के लोकप्रिय प्रोफ़ेसर रहे सतीश धवन को IISC में भारत की पहली सुपरसोनिक विंड टनल स्थापित करने का श्रेय जाता है।

सतीश धवन ही वो शख्स थे जिन्होंने INSAT- एक दूरसंचार उपग्रह,  IRS- भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह और PSLV- ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान जैसी प्रणालियों का कार्यभार संभालते हुए अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले राष्ट्रों के संघ में भारत को लाकर खड़ा कर दिया।

3 जनवरी 2002 को सतीश धवन की मृत्यु के उपरांत, भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र श्री हरिकोटा का नाम बदलकर उनके नाम पर रखा गया। भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र श्री हरिकोटा को अब प्रोफेसर सतीश धवन स्पेस सेंटर के नाम से जाना जाता है।

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प्रोफेसर सतीश धवन (बाएं), पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम (मध्य) और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ indiatimes

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