जानिए कैसे केले से बने सैनिटरी पैड ग्रामीण महिलाओं की कर रहे हैं जिंदगी सशक्त

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Updated on 24 Jan, 2017 at 6:14 pm

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महिलाओं की माहवारी यानी मासिक धर्म को लेकर भारतीय समाज में कई तरह की वर्जनाएं हैं। महिलाओं की शारीरिक संरचना में प्राकृतिक परिवर्तन का हिस्‍सा रहे इस मासिक परिवर्तन का वैज्ञानिक दृष्‍टिकोण यूं तो बहुत ही सुलझा हुआ है, लेकिन आध्‍यात्‍मिक, धार्मिक और एक तरह से कर्मकांड से रचे-पगे भारतीय समाज में इसे लेकर बहुत ही अलग-अलग तरह के मान्‍यताओं या एक तरह के टैबू से गुजरना पड़ता हैं।
 
हैरान करने वाले बात यह भी है कि जिस विकास की डगर पर हम भारतीय बढ़ रहे हैं उसमें महिला सशक्तिकरण के नाम पर जुमले या स्लोगन ही विकसित कर पाए हैं। जब महिलाओं कि माहवारी से सम्बंधित स्वास्थ्य की बात आती है तो ‘चुप्पी संस्कृति’ का ताला लगा दिया जाता है। आकंड़े बताते हैं कि भारत में सिर्फ 30 प्रतिशत महिलाएं ही माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन्स का इस्तेमाल करतीं हैं। यह आकंड़ा इसलिए भी विचलित कर सकता है, क्योंकि आज भी भारत में 88 प्रतिशत महिलाएं मासिक धर्म के दौरान अस्वस्थ और अन-हाइजनिक तरीके अपनाती हैं। 
“यानी बात साफ़ है महिलाओं की बराबरी कि कितनी भी बात कर लें, लेकिन बदलाव की रफ़्तार बहुत ही धीमी है। तब भी माताओं को अपनी बेटियों के लिए चादर के छोटे-छोटे टुकड़े कर के बक्से में छुपाना पड़ता था और आज भी चुप रहने के लिए बोला जाता है। समझने वाली बात है कि यह हर लड़की के साथ होता है। फिर इतनी प्राकृतिक और सहज बात से उन्हें असहज होने पर मजबूर क्यों कर दिया जाता है? ज़ाहिर है इस थोपी गई शर्म और चुप्पी की संस्कृति से बाहर आने का सिलसिला शुरू होना ही था।”

इस चुप्पी की संस्कृति तोड़ने और ग्रामीण महिलाओ को सस्ती कीमत पर अच्छी क्वालिटी के सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की सोच के साथ महिलाओं का दूर तक साथ निभाने आ रही है ‘साथी’।

‘साथी ‘ महिलाओं के लिए सस्ते दामों में अच्छी क्वालिटी के सैनिटरी नैपकिन तैयार करता है। ‘साथी’ की शुरूआत क्रिस्टीन कागेस्तु, अमृता सहगल , ग्रेस काने, आशुतोष कुमार, और ज़ाचरी रोज ने की। ‘साथी पैड्स ‘ का मकसद ग्रामीण महिलाओं के लिए कम दाम में अच्छे सैनिट्री नैपकिन तैयार करना है।

सोशल एंटरप्राइज साथी की शुरूआत इस मकसद के साथ हुई थी कि माहवारी महिलाओं की ज़िन्दगी में बाधा न बने। एक रिसर्च के मुताबिक, गांव की 23 प्रतिशत लड़कियां माहवारी के कारण स्कूल जाना ही छोड़ देती हैं। ये किसी भी देश के लिए काफी परेशान करने वाले आंकडे़ हैं।  ‘साथी’ का मकसद ग्रामीण महिलाओं के लिए कम दाम में अच्छे सैनिटरी नैपकिन तैयार करना था। ‘साथी’ बेकार हो चुके केले के तने से बने सस्ते सैनिटरी पैड को भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को उपलब्ध कराती है। 

साथी कि योजना ग्रामीण भारत की महिलाओं को 10 लाख पैड्स बांटने की है। जल्द ही इसी साल यह सैनिटरी पैड पूरे देश भर में वितरित किए जाएंगे।

बता दें क्रिस्टीन और अमृता दोनों ने मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी।अमृता ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है और साथी प्रॉजेक्ट के लिए यूनिवर्सिटी में अवॉर्ड भी जीता है।
अमृता बताती हैं कि पढाई के दौरान भी वह गांव की महिलाओं के लिए सस्ती दरों पर सैनिटरी पैड बनाने का विचार कर रहीं थी। उसी दौरान दोनों की एक बार मुलाकात हुई और दोनों ने एक सोशल एंटरप्राइज शुरू का निर्णय लिया। अमृता चाहती थीं कि टीम में और भी लोग हों, ताकि काम अच्छे से हो पाए और फिर भारत आकर दोनों ने एक बेहतरीन टीम खड़ी की। इसी सोच और मेहनत का फल है कि आज ‘साथी’ ग्रामीण महिलाओं के लिए दोस्त बन कर खड़ी हैं।

अमृता सहगल और क्रिस्टीन ने तय किया कि वे सैनिटरी पैड को बनाएंगे, लेकिन उस पैड का मकसद केवल सस्ता होना नहीं होगा।

बेकार केलों के तने से सेनिटरी पैड बनाये जाने कि प्रक्रिया homegrown

 
जानकारी के अनुसार भारत में केवल 12 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का प्रयोग करती हैं, लेकिन फिर भी हर महीने 9 हजार टन सैनिटरी पैड्स का कूडा का इकट्ठा होता है, जो एक चिंता का विषय है। क्रिस्टीन बताती हैं कि उनकी सोच थी कि उनका प्रोडक्ट पर्यावरण के अनकूल हो। वह नहीं चाहती थीं कि उनका प्रोडक्ट कूडे में इजाफा न करे। साथ में यह चुनौती भी थी कि आम तौर पर पैड्स को बनाने में केमिकल का इस्तेमाल होता है, उनके प्रोडक्ट में न हो। जब उनकी टीम ने  रिसर्च शुरू की तो यह चिंता का विषय था कि आखिर वो किस तरह से पर्यावरण के अनुकूल पैड बनाएं जो सस्ता भी हो। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने बेकार हो चुके केले के तने से बने सस्ते सैनिटरी पैड बनाने शुरू किए। ये पैड सस्ते तो थे ही, साथ ही पर्यावरण को भी कोई नुक्सान नहीं पहुंचा रहे थे। यानि सौ प्रतिशत पर्यावरण के अनुकूल थे।
ग्रामीण महिलाओं की दशा और सोच बदलने में ‘साथी ‘ की भूमिका सराहनीय है, क्योंकि सही जानकारी न हो पाने की वजह से अक्सर ये महिलाएं हाइजीन और स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देती हैं। इससे उन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। निश्चित तौर पर साथी एक आशा की किरण बन कर आई है।

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