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मां नहीं चाहती थी बेटी बने पहलवान, बेटी ने ओलंपिक में भारत को दिलाया ‘पदक’ सम्मान

Updated on 4 November, 2016 at 12:54 pm By

भारत ने रियो ओलंपिक्स में अपना पहला पदक हासिल कर लिया है। रियो ओलंपिक्स में भारत का नेतृत्व करने वाली पहलवान साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीत भारत को गौरवान्वित किया है।

इस जीत के साथ ही हरियाणा के रोहतक की 23 साल की साक्षी मलिक ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान बन गई हैं।

साक्षी ने महिला फ्रीस्टाइल के 58 किलोग्राम वर्ग में कजाकिस्तान की अइसुलू टाइबेकोवा को मात दे कांस्य पदक जीतकर भारत को रियो में पहला पदक दिलाया। साक्षी ने साढ़े सात घंटों के अंदर पांच फाइट पूरी की और इनमें से चार में जीत हासिल की।


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इस मुकाबले मे एक समय ऐसा भी था, जब साक्षी 0-5 से पीछे थीं, लेकिन दूसरे राउंड में उन्होंने उलटफेर करते हुए इस स्पर्धा को 8-5 से जीत लिया।

जीत के बाद भावुक साक्षी ने कहा-

“मेरी 12 साल की तपस्या लग गयी। मेरी सीनियर गीता दीदी ने पहली बार लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं भारत के लिए पहलवानी में पदक जीतने वाली पहली महिला पहलवान बनूंगी।”

साक्षी ने हर भारतीय को समर्पित किया अपना पदक

आपको बता दे कि मई, 2016 में ओलिंपिक वर्ल्ड क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में 58 किग्रा श्रेणी के सेमीफाइनल में चीन की लान झांग को हराकर साक्षी मलिक ने रियो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई किया था।

पूरे देश को गौरवान्वित करने वाली साक्षी की इस जीत से जहाँ पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने भी साक्षी को जीत की बधाई देते हुए ट्वीट किया :



“साक्षी मलिक ने इतिहास रच दिया। पूरा देश खुश है। रक्षाबंधन के दिन भारत की बेटी साक्षी ने पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। हमें साक्षी पर गर्व है।”

शुरुआती दौर में साक्षी को सामाजिक दबाव का भी सामना करना पड़ा कि लड़कियां पहलवानी नहीं करती हैं, लेकिन साक्षी पीछे नहीं हटी। परिवार ने उनका हरदम साथ दिया।

जानिए साक्षी के बारे में कुछ बातें:

साक्षी की मां उनकी पहलवानी को लेकर पहले पक्ष में नहीं थीं। साक्षी की मां कहती हैं कि मैं कभी नहीं चाहती थी कि बेटी पहलवान बने। समाज में अक्सर यही कहा जाता रहा कि पहलवानों में बुद्धि कम होती है, पढ़ाई में पिछड़ गई तो करियर कहां जाएगा।

साक्षी खेल के लिए प्रति दिन 6 से 7 घंटे तक का प्रयास करती और साथ ही पढ़ाई में 70 फीसदी मार्क्स लेकर इस मिथक को तोड़ दिया।

कुश्ती में घुसने के लिए साक्षी ने लड़कों से भी कुश्ती लड़ी है।

साक्षी ने सारी आलोचनाओं को पीछे छोड़ते हुए कुश्ती के दांव-पेंच कोच ईश्वर दाहिया से सीखे। 2002 में उन्होंने दाहिया के अंडर कोचिंग शुरू की।

2वर्ष 014 में आयोजित ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में फ्रीस्टाइल की इसी श्रेणी में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता था।

2015 के सीनियर एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में साहसिक खेल दिखाते हुए कजाकिस्तान की खिलाड़ी को पटखनी देते हुए साक्षी ने 60 किग्रा श्रेणी में उन्होंने कांस्य पदक जीता था।


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ओलंपिक खेलों में यह किसी महिला द्वारा जीता गया चौथा पदक है। साक्षी से पहले कर्णम मल्लेश्वरी (वेटलिफ्टिंग), एम.सी. मैरीकॉम (बॉक्सिंग), सायना नेहवाल (बैडमिंटन) में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हैं।

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