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भूख से जूझते ग़रीबों और बुजुर्गों का पेट पाल रहा है ‘रोटी बैंक’

Published on 5 December, 2016 at 5:11 pm By

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुंदेलखंड इलाका कई वर्षो से प्राकृति आपदाओं का दंश झेल रहा है। इस वजह से ‘वीरों की धरती’ कहलाने वाला यह इलाका पिछले कई साल से सूखे और भूख की एक जंग लड़ रहा है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, तो लोग शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। कई सरकारें आई, कई राहत पैकज और घोषणाएं भी हुई, पर बुंदेलखंड की तड़प बरकरार है।

ऐसे में भूख से जूझते ग़रीबों और बुजुर्गों के लिए ‘रोटी बैंक महोबा’ एक बड़ा सहारा बन गया है।


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‘रोटी बैंक महोबा’ न तो किसी धर्म विशेष के लोगों का काम है और न ही किसी धार्मिक गुरुओं का। न तो यह सरकारी और न ही गैर सरकारी संस्थान है। यह महोबा के कुछ लोगों द्वारा चलाया जा रहा एक अभियान है। एक पहल एक सोच है, ताकि महोबा का गरीब तबका खाली पेट न सोए।

पत्रकार तारा पाटकर को अपने लोगों की ग़रीबी खींच लाई

पेशे से पत्रकार तारा पाटकर लखनऊ में दैनिक समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस में कार्यरत थे। लेकिन उन्होंने जब अपने लोगों की गरीबी और भूखमरी देखी तो उन्होंने सोचा कि क्या कुछ लोग मिलकर अन्य लोगों की भूख नहीं मिटा सकते? यह प्रश्न उन्हें कचोटता रहा। यही वजह थी कि वे अपनी नौकरी छोड़ कर ‘रोटी बैंक’ की परिकल्पना के साथ अपने गृहनगर लौट आए। तारा पाटकर बताते हैंः

“सभी विचारधारा और दर्शन व्यर्थ हैं, अगर आपके आस-पास कोई भी भूखे पेट सोने के लिए मजबूर है। मैं समाज को अपना योगदान दे सकूं, इसलिए मैं पत्रकार बना। लेकिन मुझे महसूस हुआ कि अभी ज़मीनी स्तर पर कार्य करने की ज़्यादा ज़रूरत है, इसलिए मैने अपना कैरियर छोड़ दिया, ताकि मैं समाज सेवा के लिए ज़्यादा समय दे सकूं।”

15 अप्रैल 2015 को इस संकल्प के साथ कि ‘कोई भी भूखा न सोए’ तारा पाटकर ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर रोटी बैंक की शुरुआत की।

पाटकर बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्होंने 10 घरों से दो से चार रोटी और सब्जी का संग्रह करना शुरू किया था, जिसे शाम को उन ग़रीब ज़रूरतमंद को बांट दिया जाता था, जिन्हें भूखे पेट रात गुजारनी पड़ती थी। वक्त गुजरने के साथ सहयोग करने वालों की संख्या बढ़ी, नतीजतन रोटी बैंक को रोटी व सब्जी उपलब्ध कराने वालों की संख्या सात सौ तक पहुंच गई। आज के दिन इस पहल से पांच सौ लोगों का पेट भरता है।

गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए शहर में 12 काउंटर बनाए गए हैं। साथ ही दोनों वक़्त खाना उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

पाटकर बताते हैं कि सूखे की मार झेल रहा यह शहर नए साल में एक जनवरी से दिन में भी भोजन उपलब्ध कराने की पहल शुरू करेगा। इसके लिए शहर में 12 विशेष काउंटर बनाए गए हैं। इन केंद्रों से अब दोनों समय भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। रोटी और सब्जी इकट्ठा करने की अपनी प्रक्रिया है। एक तरफ जहां बुंदेली समाज के कार्यकर्ता घर-घर जाकर रोटी-सब्जी का संग्रह करते हैं तो उसके अलावा कई स्थानों पर ऐसे डिब्बे रखे गए हैं, जिनमें समाज के विभिन्न तबकों के लोग पैकेट में लाकर रोटी-सब्जी रख जाते हैं।



रोटी बैंक से सबसे बड़ी राहत बुजुर्ग पुरुषों, महिलाओं और भिखारियों को मिल रही है। रोटी बैंक की स्थापना के बाद दूसरे गांव से भी ज़रूरतमंद ग़रीब पेट भरने महोबा आ रहे हैं। शुक्र है, अब वहां कोई भूखे पेट नहीं सोता। पाटकर बताते हैंः 


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“एक समय ऐसा भी आया, जब खाना अत्यधिक मात्रा में संग्रह हो जाता था। ऐसे में हमें कुछ घरों से खाना लेने से इनकार करना पड़ा। हमने फिर इसे एक प्रक्रिया के तहत सुनिश्चित किया कि खाने की बर्बादी कम हो। अब अतिरिक्त भोजन गायों और भैंसों को खिलाया जाता है।”

हर ज़रूरतमंद ग़रीब को मिलता है भोजन

रोटी बैंक के लिए काम करने वाले अरुण चतुर्वेदी ने बताया कि जिन लोगों को ‘रोटी बैंक’ से खाना दिया जाता है, उनका ब्योरा दर्ज किया जाता है। इसमें संबंधित की पारिवारिक स्थिति, आय का जरिया और पृष्ठभूमि आदि को दर्ज किया जाता है, ताकि जरूरतमंद को ही खाना मिल सके।

पाटकर बताते हैं कि इस अभियान के तहत किसी से भी आर्थिक मदद नहीं ली गई है। इस अभियान में सभी वर्ग, सभी धर्म के लोगों के घरों में बनी हुई रोटी तथा सब्जी ली जाती है और उसे जरूरतमंदों में बांटा जाता है।

बुंदेलखंड में सूखे जैसे हालात की वजह से खेत खाली पडे़ हैं। रोजगार का साधन नहीं है। लिहाजा बड़ी संख्या में युवा पलायन कर गए हैं। इस स्थिति में घरों में बुजुर्ग लोग ही बचे हैं। इनके पास एक तो खाने के लिए खाद्यान्न नहीं है, दूसरा जिनके पास खाद्यान्न हैं, वे खाना पकाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे लोगों के लिए रोटी बैंक वरदान बन गया है।


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महोबा शहर से शुरू हुआ यह अभियान अब ग्रामीण इलाकों की ओर बढ़ चला है। अगर यह अभियान इसी तरह आगे बढ़ता रहा और लोगों का सहयोग मिला तो आने वाले समय में कोई भी बुंदेलखंड में भूखा नहीं सोएगा। इतना ही नहीं, आम आदमी की यह कोशिश सरकार को आइना दिखाने वाली भी है।

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