आखिर रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से क्यों निकाल बाहर करना चाहिए!

Updated on 12 Sep, 2017 at 6:55 pm

इन दिनों रोहिंग्या मुसलमानों पर चर्चा तेज हो रही है। म्यांमार से बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान पलायन कर रहे हैं। स्थानीय बहुसंख्यक बौद्धों पर आरोप है कि वे रोहिंग्या मुसलमानों का उत्पीड़न कर रहे हैं और उन्हें पलायन के लिए बाध्य कर रहे हैं। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने रोहिंग्या को पीड़ित समुदाय घोषित कर रखा है।

म्यांमार में इस खूनी संघर्ष की शुरुआत रोहिंग्या मुसलमानों ने की थी।

रोहिंग्या मुसलमान दरअसल प्रवासी बंगाली यानी बांग्लादेशी मुसलमान हैं, जो पिछले कई दशक से अवैध रूप से म्यांमार में रह रहे हैं। 1950 के दशक में बर्मा के स्वतंत्र होने के बाद रोहिंग्या शब्द का व्यवहारिक इस्तेमाल किया गया। रोहिंग्या बड़ी संख्या में अराकान प्रान्त में रहते हैं। यही वह समय था जब रोहिंग्या मुसलमानों ने अपने लिए एक स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाने के लिए देश की केन्द्रीय सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू किया था। रोहिंग्या की आबादी बढ़ने की साथ ही इन्होंने मूल निवासी बौद्धों का सफाया करना शुरू कर दिया। हालांकि, ताजा विवाद वर्ष 2012 में कथित तौर पर एक रेप की घटना को लेकर शुरू हुआ था।

सशस्त्र संघर्ष का बीजारोपण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ था।

द्वतितीय विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा के बौद्ध समुदाय व हिन्दू प्रवासियों ने आजाद हिन्द फौज को अपना समर्थन दिया था। इसकी काट के लिए अंग्रेजों ने रोहिंग्या मुसलमानों को हथियार उपलब्ध कराना शुरू कर दिया। रोहिंग्या चरमपंथियों ने इन हथियारों का इस्तेमाल स्थानीय बौद्धों व हिन्दुओं के खिलाफ किया और बड़े पैमाने पर हिंसा फैलायी। इसके बाद मूल निवासी भी इनके खिलाफ उठ खड़े हुए।

लगातार पलायन कर रहे रोहिंग्या मुसलमान बड़ी संख्या में भारत में अवैध तरीके से घुसे हैं। संयुक्तराष्ट्र द्वारा वैध शरणार्थियों की संख्या 16 हजार के करीब है, जबकि अवैध रूप से करीब 40 हजार रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं। भारत सरकार इन अवैध घुसपैठियों को निकाल बाहर करना चाहती है और इस विषय पर सक्रियता बढ़ी है। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख जैद राद अल हुसैन ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से वापस भेजने की केन्द्र सरकार की कोशिशों की निंदा की है।



रोहिंग्या मुसलमानों पर सही है भारत का रुख

रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति दुनिया के रुख को देखकर कहा जा सकता है कि इस मसले पर भारत का रुख सही है और अवैध घुसपैठियों को भारत से निकाल बाहर करना चाहिए। इसे म्यांमार और बांग्लादेश के निजी मसले की तरह क्यों नहीं देख जाना चाहिए? अगर म्यांमार पिछले कई दशक से अपने यहां रह रहे रोहिंग्या समुदाय को अवैध घुसपैठिया मानता है, तो हमें बांहें फैलाए उनका स्वागत क्यों करना चाहिए? जबकि सर्वविदित है कि रोहिंग्या बड़े पैमाने पर हिंसा में लिप्त रहे हैं। विकसित और धनी सऊदी अरब से लेकर कतर और संयुक्त अरब अमीरात सरीखे देशों को रोहिंग्या के मसले पर दया आती है, लेकिन जब इराक और सीरिया से युद्ध की वजह से लाखों की संख्या में मुसलमानों का पलायन हुआ तो ये देश उन्हें शरण देने के लिए तैयार नहीं थे। रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर इनकी नीति यही है।

सुरक्षा के लिए खतरा हैं रोहिंग्या मुसलमान

भारत ने साफ किया है कि रोहिंग्या मुसलमान आने वाले दिनों में भारत की सुरक्षा के गंभीर खतरा बन सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजीव के. चंदर ने जैद राद अल हुसैन के बयान से असहमति जताई है। चन्दर का कहना है कि अन्य देशों की तरह ही भारत में अवैध प्रवासियों को लेकर चिंतित है। हालांकि, इनकी संख्या बढ़ने से देश के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। देश में कानून को लागू करवाने का अर्थ किसी वंचित समाज के प्रति दया भाव में कमी आना नहीं है।

भारत पहले से ही बड़ी आबादी की समस्या से जूझ रहा है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश का बड़ा तबका शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्यान्य मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। यहां अपने देश से पलायन किए गए लोगों का पुनर्वास नहीं हो सका है। कश्मीरी पंडित उदाहरण हैं। ऐसे में रोहिंग्या मुसलमानों को पालने का क्या तुक है? जिन देशों को रोहिंग्या मुसलमानों पर दया आती है, वे उन्हें अपने देशों में शरण देने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें इस पर विचार भी करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र को भी इस पर विचार करना चाहिए।

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