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देश की आजादी के लिए सिर्फ 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ गए थे खुदीराम बोस

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Updated: 2:31 pm 3 Dec, 2015

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भारतीय क्रान्तिकारियों में खुदीराम बोस का नाम अग्रणी है। देश की आजादी के लिए वह 19 वर्ष की छोटी उम्र में फांसी पर चढ़ गए। भारतीय इतिहासकारों की धारणा है कि बोस अपने देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के क्रान्तिकारी देशभक्त थे।

बंग भंग (बंगाल विभाजन) के विरोध में चलाए गए आन्दोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया था। बंगाल में बोस क्रान्तिकारियों की युगान्तर नामक संस्था से जुड़े हुए थे। वर्ष 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया तब उस समय इसके विरोध में सड़कों पर उतरे कई भारतीयों को कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने कड़ा दंड दिया था।


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बाद में किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेज दिया गया।

इसके विरोध में युगान्तर संस्था ने एक बैठक कर किंग्जफोर्ड को मारने के लिए प्रस्ताव पारित किया और इस काम के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी का चयन किया गया। खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों ही मुजफ्फरपुर पहुंचे और किंग्जफोर्ड की घोड़ागारी पर बम से हमला किया। लेकिन संयोग से किंग्जफोर्ड उस घोड़ागाड़ी में नहीं था और दो यूरोपियन स्त्रियों को अपने प्राण गँवाने पड़े।

इस घटना के बाद पुलिस उनके पीछे पड़ गई। उन दोनों को मुजफ्फरपुर से 24 किलोमीडल दूर वैनी रेलवे स्टेशन पर घेर लिया गया। पुलिस से घिरा देख प्रफुल्लकुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी, जबकि खुदीराम पकड़े गए। उन्हें, 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई।

हालांकि, इस घटना के बाद किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड दी और जिन क्रांतिकारियों को उसने कष्ट दिया था उनके भय से शीघ्र ही उसकी भी मौत भी हो गई।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को एक नई दिशा देने वाले ज्वलन्त क्रान्तिकारी खुदीराम को हम सबका सलाम।

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