आरक्षण अधिकार है, मदद या फिर एक बीमारी? जरूरी है की हम इन 8 पहलुओं को जानें।

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Updated on 12 Jul, 2016 at 8:53 pm

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आरक्षण क्या है? मदद या फिर एक बीमारी? हम इस लेख के माध्यम से पड़ताल करने जा रहे हैं।

1. सामान्य श्रेणी के लोग, जिन्हें लगता है कि मेरिट को तरजीह देते हुए जाति पर आधारित आरक्षण को एकबारगी खत्म कर दिया जाए, वे इस पूरे प्रकरण को विवादित बना रहे हैं।

ठीक है, व्यवस्था में मेरिट को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन क्या आपने जाति के बारे में सोचना बन्द कर दिया है। जाति प्रथा तो अब भी बदस्तूर जारी है।

2. अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की कैटगरी के धनी लोगों के बच्चे आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, यह जानते हुए भी कि इससे जाति पर आधारित आरक्षण की अवधि और लंबी खिंचेगी।

अब आपको पता चल गया होगा कि अधिकतर नौकरियां और कॉलेज की सीट जरूरतमंदों को नहीं मिल रही हैं।


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दरअसल SC/ST/OBC के कोटे से आरक्षण का लाभ लेने वाली आखिरी पीढ़ी के लोग अपने-अपने जाति समूहों में नवधनाढ्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

3. सामान्य श्रेणी के लोगों को यह पूछने का अधिकार नहीं है कि कुछ छात्र जिन्हें बेहद कम नम्बर मिले, उनका दाखिला देश के अग्रणी शिक्षण-संस्थाओं में कैसे हो गया।

या उन्हें कैसे अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। इसमें उनकी गलती नहीं है। गलती सिस्टम की है।

4. आरक्षण एक मदद है, मौलिक अधिकार नहीं।

SC/ST/OBC कोटे लिए सरकार को ब्लैकमेल करना सही रास्ता नहीं है।

5. भारतीय संविधान की धारा 16(4) में कहा गया है कि आरक्षण की व्यवस्था ‘किसी भी निम्न वर्ग के नागरिकों’ के लिए हो सकती है।

इसमें ‘वर्ग’ की बात की गई थी। ‘जाति’ या ‘धर्म’ की नहीं।

6. एक के बाद एक आरक्षण लाभ कहीं से उचित नहीं है।

एक गरीब छात्र आरक्षण के दम पर कॉलेज में सीट भी लेता है। वही छात्र आरक्षण के दम पर नौकरी भी हथियाता है।



इसका कोई तार्किक आधार नहीं है कि एक ही व्यक्ति को बार-बार आरक्षण का लाभ क्यों दिया जाए। आरक्षण के जरिए एक बार किसी के लिए रास्ता बनाइए और उसे उस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करिए।

7. आरक्षण की कभी न खत्म होने वाली व्यवस्था की वजह से पब्लिक सेक्टर की कम्पनियां भी त्रस्त हैं।

इनके लचर प्रदर्शन के पीछे कहीं न कहीं आरक्षण की राजनीति जिम्मेदार है।

8. कुछ नागरिकों को अतिरिक्त मदद की जरूरत पड़ती है।

लेकिन मौजूदा आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक दायित्व का निर्वाह करने में पूरी तरह असक्षम है।

और तो और देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने कहा थाः

आर्थिक आधार पर मदद की व्यवस्था की जानी चाहिए, न कि जाति के आधार पर। यह सच है कि हम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से कुछ नियमों और कायदों में बंधे हुए हैं। उन्हें मदद की जरूरत है, विशेषकर सेवा के क्षेत्र में।

लेकिन कुछ राजनेताओं के लिए आरक्षण वोट बैंक बनाने का जरिया भर रह गया है। सामान्य श्रेणी के कुछ लोग जीवन में कुछ न कर पाने या सरकारी क्षेत्र में नौकरी न मिलने को आरक्षण से जोड़कर देख लेते हैं। वहीं SC/ST/OBC कैटगरी के कुछ लोग इसे खास सुविधा समझते हैं और मुफ्तखोरी के आदी होते जाते हैं। कुल मिलाकर आरक्षण की व्यवस्था बेतरतीब हो गई है।

आरक्षण के मसले पर आप क्या सोचते हैं। यहां कमेन्ट बॉक्स में लिखकर भेज सकते हैं।


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